सूरजमुखी हूं, मैं तुम महक बन छा जाना
जब धरती पर पांव रखूं, तुम मृदंग बन आ जाना…
तेरे आने से अब सूरज अस्त नहीं होता
कोमल मन का कबीर हर पल जागता
कुदरत है, बड़ी कारसाज खूब प्यार सिखाता
जैसे पहाड़ की छाती चीर झरना निकलता
सर्द पौष मौसम में बर्फ की मानिंद जम जाना…
जब धरती पर पांव रखूं तुम मृदंग बन आ जाना
कभी तितली कभी जुगनू रोशनी बन आते हो
भागीरथी सी शरारत कर रेत से बिखर जाते हो
शब्दों को उच्चारित कर महा सृजन करते हो
प्रेम से श्रृंगारित मन की खूबसूरत तुम अभिव्यक्ति हो जाना….
जब धरती पर पांव रखूं तुम मृदंग बन आ जाना
नश्वर संसार के जीवन अस्तित्व में पूर्ण सकारात्मकता रखेंगे
कुदरत के दिए पंच तत्व को सदा सहेजेंगे
जिंदगी के तर्जुमान परखने खुशबुओं से मुलाकात करेंगे
सांसो की डोर मेरी थामें सफर पर बढ़ते जाना…..
जब धरती पर पांव रखूं तुम मृदंग बन आ जाना
मायावी दुनिया के रहस्य से पर्दे तुम हटाना
जिंदगी की हर सच्चाई सदा मुझे सीखलाना
सभी पहलू का विश्लेषण मंथन संग गवेषणा बन जाना…
जब धरती पर पांव रखूं तुम मृदंग बन आ जाना
हवा गाती धूप नृत्य करती है गहरा सुकून मिला है
हमारे बीच शब्दों की जरूरत नहीं प्रेम पुष्प खिला है
जन्म जन्मांतर का रिश्ता है ,कभी ना कोई गिला है
युद्ध से लौटे सिपाही जैसा आदिश तुम प्यार करना
जब धरती पर पांव रखूं तुम मृदंग बना आ जाना
चिंतक साहित्यकार
डॉ अर्चना श्रेया