📘 ओ३म् 📙
📚 ईश्वरीय वाणी वेद 📚
*ओ३म् अनच्छये तुरगातु जीवमेजद् ध्रुवं मध्य आ पस्त्यानाम्।जीवो मृतस्य चरति स्वधाभिरमर्त्यो मत्येर्ना सयोनि:। ऋग्वेद १-१६४-३०।।*
🍇 *मंत्र का पदार्थ*🍇
🍐 पस्त्यानाम् मध्ये = प्रकृति से बने हुए जड़ घरों के मध्य में 🍐 ध्रुवम् जीवम् = न बदलने वाले जीव को 🍐 एजत् = चलायमान करता हुआ 🍐 तुरगातु अनत् = विना विलंब के समय पर सबको अनुप्राणित करता हुआ 🍐 आशये= मैं ईश्वर अन्तर्यामी रुप से सोता अर्थात् ठहरता हूं।🍐 जीव: = जीव 🍐 मृतस्य स्वधाभि:= चेतना रहित जड़ जगत् की प्रकृतियों की सहायता से 🍐 चरति= गति युक्त होता है।🍐 अमर्त्य: = न मरने वाला जीव 🍐 मर्त्येन = मरण धर्म वाले शरीर के साथ 🍐 सयोनि:= जन्म लेने वाला 🍐 आ = होता है।
🌹 मंत्र की मीमांसा 🌹
🪷 *त्रैतवाद सिद्धि*🪷
संसार में तीन ही वास्तविक सत्तायें *ईश्वर जीव और प्रकृति* हैं इस बात को परमात्मा ने प्रमाणों से सिद्ध किया है।इस बात की पुष्टि में सांख्य कारों ने एक दृष्टांत दिया है।
कहते हैं कि एक लंगड़ा है,चल नहीं सकता।दूसरा अंधा है देख नहीं सकता। दोनों यात्रा करने में समर्थ नहीं हैं। लंगड़ा बोला, वो भाई दिव्यांग जी तेरे पैर हैं आंखें नहीं और मेरी आंखें हैं पैर नहीं। तू मुझे कंधे पर बिठा ले। मैं मार्ग देखता चलुंगा।
तू मेरे बताये मार्ग पर पैरों से चलना।हम दोनों मिलकर यात्रा करेंगे।
अब इस दृष्टांत से द्राष्टांत की मीमांसा करते हैं। *जीव की आंखें हैं,पैर नहीं। प्रकृति के पैर हैं आंखें नहीं* इस प्रकार समस्त चराचर की संपूर्ण चेष्टाओं की कहानी लंगडे अंधे के सहयोग जैसी है।
अब एक नया प्रश्न और खड़ा होता है कि क्या *पुरुष (आंख वाला जीव) और प्रकृति (पैर वाली जड़ प्रकृति)* से ही काम चल जाएगा? क्या लंगड़ा और अंधा मिलकर समस्त सृष्टि के समस्त प्रपंच की व्याख्या कर सकेंगे? जी नहीं। संभव ही नहीं।
इसी का उत्तर देते हुए ईश्वरीय वाणी वेद 📚 कहता है *अनत् शये तुरगातु* अर्थात् इस 🦜 संयोग – वियोग 🦜 को समुचित और यथेष्ट रुप देने के लिए ईश्वर इन दोनों में सर्वव्यापक रुप से और जीव के हृदय में स्थित होकर अनुप्राणित करता है।इस प्रकार। *अंधा (जीव) लंगड़ी प्रकृति और इन दोनो को अनुप्राणित करने वाली तीसरी सत्ता है ईश्वर* इन तीनों से मिलकर यह अद्भुत ब्रह्माण्ड उत्पति होता, चलता और समय पर प्रलय को प्राप्त होता है। यही रहस्य है। *त्रैतवाद सिद्धि* का।
आचार्य सुरेश जोशी
🪭 वैदिक प्रवक्ता 🪭