संस्मरण बात उन दिनों की है.

बात उन दिनों की है, जब कॉलेज के अंतिम वर्ष में थी।

बड़ी दीदी (बड़े पापा की बेटी) की शादी होनी थी. उसी साल ,पापा मेरे लिए भी रिश्ता देख रहे थे। तबबड़ी माँ ने अपने बहन के बेटे के बारे में पापा को बताया ,फोटो तो देखचुके थे और सबको पसंद आ गया। लड़के का परिवार लखनऊ में रहता था।
सब ने कहा वो शादी में तो आ ही रहा है ,एक साथ सब देख मिल लेंगे और समझ आ गया तो सगाई कर देंगे।
हालाँकि मुझे आगे पढ़ना था परन्तु पापा की मर्ज़ी के आगे हम सब कह नहीं पाते थे। खैर शादी के इक दिन पहले वो लोग भी आ गए उनके ठहरने का प्रबंध धर्मशाला में ही किया था, शादी की रस्मों में आमना सामना हुआ दिखने में अच्छा था वो सभी को पसंद आया ,शादी वाले माहौल में हम सब बहने चचेरी ,बुआ की बेटियां सब खूब मस्ती मजाक करते ,बुआ की बिटिया का भी रिश्ता तय होना था ,पता चला इन महाशय को कभी वो पसंद आये कभी मेरी छोटी बहन। मुझे पता चला बहुत बुरा लगा मैं कहा भाड़ में जाये रिश्ता और लड़का, अच्छा ही है परन्तु उस एक दिन में उसके परिवार ने और मेरे बड़ेपापा माँ ने उसे क्या समझाया, वो राज़ी हो गया। सुबह मुझे सब उठा रहे गुड्डी जल्दी करो तैयार हो जाओ वो लोग मान गए। अभी ९ बजे उनकी ट्रेन है,मुझे काटो तो खून नहीं ये क्या बात हुई?
बहुत जल्दबाज़ी में शगुन दिया उन्होंने और चल दिए ,दो महीने बाद सगाई हो गई।
हमारी फ़ोन पर बात होती थी हफ्ते में एक बार। परन्तु मैं हमेशा से महसूस करती वो ज्यादा दिलचस्पी न लेता, इस रिश्ते में। ।इस बीच छोटी बहन का रिश्ता भी लखनऊ में ही पक्का हो गया पापा कहते अच्छा है दोनों बहने एक शहर में जाओगी जब शादी की तारीख पक्की करने पापा गए तो एकदम से उन्होंने गाड़ी की मांग कर दी हमारी इतनी ताकत न थी । आखिर दोनों बहनो की शादी करनी थी ,फिर से घर वालों की आपस में बात हुई पर इस बार मैंने हिम्मत दिखा कर पापा से कह दिया नहीं करनी शादी वहां पता नहीं उस समय वो हिम्मत कहाँ से आयी पापा टेंशन में तू बड़ी है तेरी नहीं हुई तो छोटी की भी रुक जानी है।
मेरा इरादा इस बार पक्का था ,ये मांग गलत थी खैर दो तीन महीने बाद वहां से फिर फ़ोन आया। उसने बात करनी चाही, उसकी दीदी ने समझाया पर मेरे इरादे अटल थे। रिश्ता टूट गया ,पापा बहुत उदास रहते फिर छोटी बहन की बुआ सास ने
अपने लड़के के लिए मेरा रिश्ता माँगा और एक साल बाद दोनों बहनो की शादी हो गयी आज मैं खुश हूँ अपने जीवनसाथी के साथ । हालाँकि पढ़ने का सपना पूरा ना
हो पाया क्योकि समाज में आज भी लड़कियों को बोझ न सही पर जिम्मेदारी माना जाता है

नंदिनी लहेजा
रायपुर(छत्तीसगढ़)

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