क्या तुमने अपने रंग में कोई भंग मिलाया।
के दीदे आफ़ताब में मुझे चाँद नज़र आया॥१
सीधे २ राह पर मैं सीधे ही चल रहा था।
कैसा खुलूश आपका के कदम डगमगाया॥२
उथल पुथल है दिल में बेताबी बढ़ गयी है।
के जब से ख़बर मुझको वस्ले हुज़ूर आया॥३
ये इत्मिनान रखना रंगूँगा उनको नज़रों से।
ये चश्म ए मोहब्बत है और पैग़ामे ख़ुदाया॥४
अगर उज्र है तो कह दो के मुड़ के न देखें।
उनके ऐसी अदा पे है मुझको प्यार आया॥५
मैं अक्सर ही पीकर हूँ नशे मन ते झूमा।
गोया निगाहें हैं उनकी या है कोई हाला॥६
सोचता हूँ मैं खुद को छुपा लूँ उन्हीं से।
मगर है यह उत्सव बरस भर में आया॥७
इक ही दिन रंगूँ ये मुनासिब नहीं है।
बस यही सोच उनको है दिल में बिठाया॥८
बाल कृष्ण मिश्र कृष्ण
बूंदी राजस्थान
२२.०४.२०२४