वो दास्तां जो आज मेरी ज़िन्दगी हुईं।-रूपेंद्र नाथ सिंह रूप

ग़ज़ल 
मैं ने कभी पढ़ी थी कहानी लिखी हुई।
वो दास्तां जो आज मेरी ज़िन्दगी हुईं।

ख़ुशबू सी हर तरफ़ है कि महकी हुई बयार।
गुलशन में आज कोई कली है खिली हुई।

उनके सिवा न और कोई है ख़याल में।
मेरी तमाम फ़िक्र है उनसे जुड़ी हुई।

पोशीदा कुछ नहीं है मेरे पास दोस्तो।
ये ज़िन्दगी किताब है मेरी खुली हुई।

देखा है मुझे आपने जो प्यार से अभी।
उम्मीद कोई जाग उठी फिर दबी हुई।

मन में बसे हैं राम कोई दूसरा नहीं।
यह ज़िन्दगी हमारी तो अब राम की हुई।

भूला नहीं है रूप वो लमहा अभी हमें।
जब आप से हमारी मुलाकात थी हुई।

रूपेंद्र नाथ सिंह रूप

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