ग़ज़ल
पिछले दिनों वो मुझसे बहुत बद गुमान था
वो दौर मेरे वास्ते इक इम्तिहान था
खुश आमदीद आपके रहने का शुक्रिया
दर अस्ल मेरे दिल का ये खाली मकान था
बिखरी थी उसके हुस्न की हर सिमत ही महक
महफ़िल में जैसे रक्खा हुआ इत्रदान था
लफ़्ज़ों की मीन कारी नहीं सिर्फ जानेमन
मज़मून खत का दिल का मेरे तर्जुमान था
ये देखके फसुरदा मेरा दिल हुआ बहुत
चेहरे पे उसके आज गमों का निशान था
अमनो अमां का देता रहा दर्स वो मगर
जाने क्यों आज हाथों में तीरो कमान था
मै चाह के भी उसको भुला सकता ही नहीं
वो मेरा पहला प्यार था वो मेरी जान था
तारिक़ गवाही देते हैँ ये आज भी महल
माज़ी का वो ज़माना बहुत आलिशान था