धन को धर्म की मर्यादा में रहकर ही प्राप्त करें- शास्त्री

बस्ती। प्रभु भजन में आनंद आए तो भूख प्यास भूल जाती है। मानव जीवन का उद्देश्य केवल धन संग्रह नहीं है। धर्म मुख्य है। धन को धर्म की मर्यादा में रहकर ही प्राप्त करना चाहिए। जगत में दूसरों को रुलाना नहीं, खुद रो लेना क्योंकि रोने से पाप जलता है। यह सद्विचार गुरुवार को डॉ राम सजीवन शास्त्री नें हर्रैया के समौड़ी गाँव में श्रीमद्भागवत कथा के सातवें दिन व्यक्त किया।
कृष्ण सुदामा मिलन की कथा का वर्णन करते हुए शास्त्री जी ने कहा कि पति यदि धन,संपत्ति, सुख, सुविधा दे और पत्नी ऐसे पति की सेवा करे तो इसमें आश्चर्य क्या है। धन्य है सुदामा की पत्नी सुशीला जिन्होंने भूखे रहकर भी दरिद्र पति को भी परमेश्वर मानकर सेवा करती रही। भगवान श्री कृष्ण ने जो संपत्ति कुबेर के पास भी नहीं है उसे सुदामा को दिया। सारा विश्व श्रीकृष्ण का वंदन करता है और वे एक दरिद्र ब्राम्हण और उनकी पत्नी सुदामा का वंदन करते हैं। सुदामा ने ईश्वर से निरपेक्ष प्रेम किया तो उन्होंने सुदामा को अपना लिया और अपने जैसा वैभवशाली भी बना दिया। कथा को विश्राम देते हुए शास्त्री जी ने कहा कि सतकर्म का कोई अन्त नही, कथा सुनकर जीवन में उतारोगे तो ही श्रवण सार्थक होगा।
इस दौरान देवेंद्र नाथ मिश्र बाबू जी, धीरेन्द्र नाथ मिश्र, श्रीनाथ मिश्र, सुरेंद्र नाथ मिश्र, राम सुमति मिश्र, नन्द कुमार मिश्र, धरणीधर मिश्र, रामफूल मिश्र, विजय नारायण मिश्र, विंटू बाबा, ओम प्रकाश मिश्र, उमाकान्त तिवारी, अनिल मिश्र, सुनील मिश्र, ओमजी मिश्र, लालजी मिश्र, दुर्गा प्रसाद मिश्र, महेंद्र मिश्र, जगदंबा ओझा, प्रेम शंकर ओझा, पवन शुक्ल, विजय मिश्र, काशी प्रसाद पाण्डेय, जय प्रकाश पाण्डेय, भाल चंद्र शुक्ल, पशुपति नाथ शुक्ल, गणेश शुक्ल, मनमोहन, भवानी सेठ, गंगोत्री प्रसाद शुक्ल, रमेश चन्द्र शुक्ल, आनन्द पाण्डेय, चन्द्र प्रकाश मिश्र, बब्बू, रवीश, वेद उत्तम, बजरंगी, गोपाल, हर्ष, प्रशान्त, छोटू सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।

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