मेरा हंसना भी ज़माने को बुरा लगता है, सलीम बस्तवी अज़ीज़ी,

अनुराग लक्ष्य, 30 अक्टूबर
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी,
मुंबई संवाददाता ।
समाईन आप यकीन मानें कि ग़ालिब, मीर, फ़ैज़, दाग और फिराक गोरखपुरी से होती हुई शायरी जो मेरी दहलीज़ तक पहुंची, मैने उससे बेपनाह मुहब्बत की, और यह उसी की देन है कि मैं आज हिंदुस्तान की मायेनाज़ हस्तियों के बीच खड़े होकर कुछ कहने और सुनने की जसारत करता हूं ।
आज अपनी शायरी के खजानों से निकालकर कुछ मोतियां आपकी समा अतों और मुहब्बतों के हवाले कर रहा हूं । उम्मीद है, कि आपकी दुआएं ज़रूर मिलेंगी।
,, तालियों की गड़गड़ाहट से दबा जाता हूं मैं
शेर कहता हूं तो ग़ज़लों में समा जाता हूं मैं
हमने माना मीर ग़ालिब का नहीं है दौर यह
फिर भी शौक़ ओ ज़ौक से अब भी सुना जाता हूं मैं,,,
,, मेरा हंसना भी ज़माने को बुरा लगता है
आप बतलाइए कि आपको क्या लगता है
जो भी मिलता है नया दोस्त मुझे दुनिया में
सानेहा यह कि मेरा दर्द नया लगता है,,
,, प्यार एहसास के शोलाें को बढ़ा देता है
गम के तूफाँ में भी जीने का मज़ा देता है
इस हकीकत को हम इस रंग में करते हैं बयां
तुमको फुरकत में सज़ा, हमको मज़ा देता है,,
,, आएगा इन्कलाब ज़माने में किस तरह
सच बोलने को कोई भी तैयार नहीं है
उतरोगे पार कैसे ज़रा यह तो सोचलो
कश्ती तुम्हारे पास है पतवार नहीं है,,,
मुझको मेरे मुल्क की गुर्बत भी है दिल से कुबूल
प्यार के बदले मिले नफ़रत भी है दिल से कुबूल
जिसको दौलत की हो ख्वाहिश जाए वोह दुबई कतर
चंद सिक्कों के लिए कैसे मैं भारत छोड़ दूं
है जो अपने मुल्क की कैसे सदाकत छोड़ दू,,,
……. सलीम बस्तवी अज़ीज़ी ……

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