पुस्तक समीक्षा
‘अनमना चाँद’ (गीत संग्रह ) कृत नवल किशोर सिंह
समीक्षक – सुधीर श्रीवास्तव
नवल किशोर सिंह का गीत-संग्रह ‘अनमना चाँद’ संवेदनाओं के एक दस्तावेज़ सरीखा है, प्रस्तुत गीत-संग्रह स्मृतिशेष माता सुकेश्वरी देवी एवं पिता अभय नारायण सिंह को समर्पित कर गीतकार ने संस्कारबोध, पारिवारिक आत्मीयता और अपनी जड़ों के प्रति कृतज्ञता का परिचय दिया है है। संग्रह में राधाकृष्ण दीक्षित एवं डॉ. ओमप्रकाश मिश्र ‘मधुव्रत’ के शुभकामना संदेश, अनीता सुधीर ‘आख्या’ की मंगलाशा के साथ ‘अपनी बात’ में गीतकार ने अपने गीत-सृजन की यात्रात्यक परिचय दिया है।
संग्रह का आरंभ ‘माँ शारदे वरदान दो’ से होता हुआ, ‘बाबा कैलासी’ और ‘हे कृष्ण कन्हैया’ के भक्ति-भाव में आगे बढ़ता हुआ ‘मणिमय भारत’, ‘मेरी प्यारी हिंदी’ और ‘अपनी बोली’ में मातृभाषा के प्रति अनुराग तथा ‘राखी’ में पारिवारिक आत्मीयता मुखरित होती है। ‘प्रेम पयस’, ‘प्रेम पत्र’, ‘चाँद मेरे’ और ‘मधुबन में कल गान’ जैसे गीत ‘कुसुमाकर’, ‘तन-मन पुलक बसंत’ और ‘साँझ सुंदरी’ प्रकृति-सौंदर्य के बोध को उकेरने के सुंदर सार्थक प्रयासों के अलावा‘किन्नर की व्यथा’, ‘छप्पर’, ‘धुनिया’ और ‘जलती-भुनती बुधनी’ से सामाजिक यथार्थ तथा जनजीवन की पीड़ा को स्वरांकित कर ‘यादें—जीवन धन स्मृतियों का खजाना’ और ‘मधुघट में मधुशेष नहीं है’ जीवन-दर्शन एवं स्मृतियों की महत्ता के आयाम को अपनी दृष्टि से रेखांकित कर अपनी चिंतन क्षमता का उदाहरण प्रस्तुत किया है।
प्रस्तुत संग्रह के माध्यम से गीतकार कविता को जीवन को समझने, गहराई से चिंतन कर महसूस करने और अभिव्यक्त को माध्यम बनाने में भी अपनी भावुक संवेदना के अपनी व्यक्तिगत सोच के साथ सामूहिक सांस्कृतिक चेतना और सामाजिक सरोकारों को अपने गीतों के माध्यम से आप जनमानस की भावनाओं को अपने गीतों से आधार देने की कोशिश है।
अपने नाम के अनुरूप ‘अनमना चाँद’ अपने आप में संग्रह कै प्रतीक जैसा है। चाँद सामान्यतः सौंदर्य, शीतलता, प्रेम और आकर्षण के प्रतीक के तौर पर देखा जाता है; किंतु उसके साथ ‘अनमना’ विशेषण जुड़ते ही उसके अर्थ में एक भावात्मक उदासी, विरक्ति और अंतर्द्वंद्व का संचार हो जाता है। मानो ऐसा मन, जो संसार के सौंदर्य के बीच उपस्थित होकर भी किसी अनकही पीड़ा, अधूरी आकांक्षा या स्मृति में खोया हुआ है। यह अनमनापन प्रेम-विरह का हो सकता है, सामाजिक विसंगतियों से उपजा हो सकता है अथवा जीवन की जटिलताओं के प्रति संवेदनशील मन की प्रतिक्रिया हो सकता है।
लेखक के गीतों की प्रमुख विशेषताओं में लोकजीवन से जुड़ी अभिव्यक्तियाँ और माटी की सुगंध भाव-भाषा के उल्लेख के साथ लोकसंस्कृति, आत्मीय संबोधन और सहज संवाद है।
‘छप्पर’, ‘धुनिया’ और ‘अपनी बोली’ जैसे शब्द पाठक को सीधे लोकजीवन के बीच ले जाते हैं। ऐसी शब्दावली गीतों को कृत्रिम अलंकरण से बचाकर जीवन के निकट लाती है। देशज शब्दों का प्रयोग केवल भाषायी विविधता नहीं बढ़ाता, बल्कि रचनाओं को सांस्कृतिक पहचान भी प्रदान करता है।
नवल किशोर सिंह का प्रस्तुत गीत संग्रह हिंदी साहित्य के प्रति उनके साहित्यिक अनुराग और अपने अनुभवों को शब्द देकर जीवन के विविध पक्षों को गीतों के रुप में स्वर देने की सफल कोशिश कहना अतिशयोक्ति नहीं है।
अपने स्वभाव के अनुरूप गीतकार नवल जी ने बिना किसी किन्तु परंतु और अपेक्षाओं से खुद को बचाते हुए आम लोगों के समक्ष रखा है। इसे आत्मविश्वास मानते हुए गीत संग्रह की सफलता से परे देखना अनुचित है।
मैं नवल जी के हौसले की प्रशंसा के साथ बधाइयां शुभकामनाएं उज्ज्वल भविष्य की कामना प्रेषित करते हुए विश्वास करता हूँ कि आपके अगले संग्रह की प्रतीक्षा ज्यादा लंबी नहीं होगी।
अनेकानेक शुभेच्छाओं के साथ….
गोण्डा उत्तर प्रदेश