पिता की विदाई के बाद परिवार का संबल बनी किशोरी, जिम्मेदारियों ने उम्र से पहले बनाया बड़ा
फरीदाबाद। पिता की मृत्यु का दर्द किसी भी संतान के लिए असहनीय होता है, लेकिन एक किशोरी ने अपने पिता को खोने के बाद जिस अद्भुत धैर्य और जिम्मेदारी का परिचय दिया, वह हर किसी को भावुक कर देने वाला है।
पिता की मृत्यु के बाद घर में शोक का माहौल था। परिजन और परिचित परिवार को ढांढस बंधाने पहुंच रहे थे। इसी बीच करीब 15-16 वर्ष की बेटी अपने पिता के निश्चेत शरीर के पास शांत खड़ी थी। उसकी आंखों से आंसू नहीं निकल रहे थे, लेकिन आवाज में गहरा दर्द साफ झलक रहा था।
सांत्वना देने के लिए जब कोई महिला उसे गले लगाती तो वह अपने दर्द को भीतर दबाकर कहती—“आंटी, मेरी मम्मी को संभाल लीजिए… मेरी छोटी बहन का ध्यान रखिए।”
पिता को खोने का गम उसके मन को भीतर तक तोड़ चुका था। वह भी चाहती थी कि पिता से लिपटकर फूट-फूटकर रोए, लेकिन मां और छोटी बहन की स्थिति ने उसे अपनी जिम्मेदारियों का एहसास करा दिया। उसने अपने निजी दुख को पीछे रखते हुए मां और छोटी बहन को संभालने का संकल्प लिया।
जिस छोटी बहन को वह कल तक छोटी-छोटी बातों पर डांटती थी, उसी को उस दिन उसने अपने सीने से लगाकर रखा। पिता की मौत ने उसे केवल पिता से ही वंचित नहीं किया, बल्कि उसे समय से पहले जिम्मेदार भी बना दिया।
यह प्रसंग इस बात का मार्मिक उदाहरण है कि बेटियां केवल घर की खुशियां ही नहीं होतीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर पूरे परिवार के लिए मजबूत सहारा भी बन सकती हैं। कुछ बेटियां विवाह के बाद घर छोड़ती हैं, तो कुछ बेटियां पिता की विदाई के बाद पूरे परिवार की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठा लेती हैं।
ऐसी अद्भुत हिम्मत और संवेदनशीलता को नमन करते हुए लेखक डॉ. दीपा शर्मा ‘उजाला’, फरीदाबाद ने इस भावपूर्ण प्रसंग के माध्यम से बेटियों के साहस और पारिवारिक जिम्मेदारी को रेखांकित किया है।