आइना किस किस को अब दिखलाउँ मैं,
फिर कहानी क्या वही दोहराऊँ मैं।
ख़ुद को कितना और अब उलझाऊं मैं,
जी तो करता है तुझे झुठलाऊँ मैं।
ज़िंदगी गर बार है तुझ पर मेरी,
तू कहे तो आज ही मर जाऊँ मैं।
नाम,शोहरत,ज़र,जमीं,ओहदा,लक़ब,
क्या है मेरे पास की इठलाऊँ मैं।
उस ने इक फ़रमान जारी कर दिया,
हर घड़ी बस उसके ही गुन गाऊँ मैं।
कब तलक़ इक हद में रख्खूँ दोस्ती,
सोचता हूँ तुझ से अब खुल जाऊँ मैं।
मश्वरा ढलते हुये सूरज का है,
रात होने को है अब घर जाऊँ मैं।
जिन चेराग़ों को किया रौशन नदीम,
अब वही कहतें हैं की बुझ जाऊँ मैं।
नदीम अब्बासी “नदीम”
गोरखपुर।।