महेन्द्र कुमार उपाध्याय
अयोध्या धाम। धर्म नगरी अयोध्या स्थित ‘जानकी शरण सरजू कुंज’ में आयोजित एक आध्यात्मिक संगोष्ठी के दौरान मठाधीश एवं संत श्री जानकी शरण महाराज ने पितृपक्ष के महत्व और इससे जुड़ी मान्यताओं पर विस्तार से प्रकाश डाला। महाराज जी ने बताया कि सनातन संस्कृति में पितृपक्ष केवल पूर्वजों के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करने का समय नहीं है, बल्कि यह उनकी कृपा प्राप्त करने और अपनी पीढ़ियों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का एक पवित्र अवसर है।
क्या होता है पितृपक्ष संत श्री जानकी शरण महाराज ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि आश्विन मास के कृष्ण पक्ष के सोलह दिनों को पितृपक्ष या महालय कहा जाता है। इस दौरान पृथ्वी लोक पर हमारे पूर्वज सूक्ष्म रूप में अपने परिजनों के पास आते हैं। यदि इन दिनों में श्रद्धापूर्वक उनका स्मरण, तर्पण और पिंडदान किया जाए, तो वे तृप्त होकर अपनी संतानों को आरोग्य, सुख-समृद्धि और वंश वृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।
पितृ दोष और उसके निवारण के उपाय संगोष्ठी में महाराज जी ने पितृ दोष के कारणों और उसके सरल निवारण के उपायों पर भी चर्चा की निवारण के मुख्य उपाय पितृपक्ष के इन सोलह दिनों में नियमित रूप से दक्षिण दिशा की ओर मुख करके अपने पूर्वजों के नाम से जल तर्पण करना चाहिए।
ब्राह्मण भोज और दान अमावस्या तिथि के दिन जरूरतमंदों, गरीबों और ब्राह्मणों को भोजन कराना तथा अन्न, वस्त्र या फल का दान करना अत्यंत फलदायी होता है। पंचबलि कर्म भोजन तैयार करते समय गाय, कुत्ता, कौवा, चींटी और देवताओं के लिए अंश (पंचबलि) अवश्य निकालना चाहिए। इससे पितृ दोष का शमन होता है। पीपल की सेवा: शनिवार के दिन पीपल के पेड़ पर जल चढ़ाने और दीपदान करने से भी पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है। महाराज जी ने अंत में संदेश दिया कि हमें अपने बुजुर्गों का आदर जीवन जीते जी करना चाहिए, क्योंकि जीवित रहते उनकी सेवा करना ही सबसे बड़ा पितृ तर्पण है। इस अवसर पर बड़ी संख्या में स्थानीय श्रद्धालु और संत समाज के लोग उपस्थित रहे।