( कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की 146 वीं जयंती )
जिसको पढ़कर इस दुनिया की आँखें फिर हों जाएँ नम, उस प्रेमचन्द के जैसा इक गोदान कहाँ से लाऊँ मैं, सलीम बस्तवी अज़ीज़ी,,,,
अनुराग लक्ष्य, 1 अगस्त
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी
मुम्बई संवाददाता ।
बस्ती शहर की प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था अदबी संगम के तत्वाधान में बीती शाम कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की 146 वीं जयंती के अवसर पर कलेक्ट्रेट परिसर में एक काव्य संध्या एवम् सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। जिसकी अध्यक्षता बस्ती की साहित्यिक गतिविधियों के भीष्म पितामह डॉ राम कृष्ण लाल जगमग ने की। बतौर उपस्थित रहे जनपद के ख्यातिलब्ध डॉक्टर वी के वर्मा।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि डॉक्टर वर्मा एवं ख्यातिलब्ध रचनाकार डॉ राम कृष्ण लाल जगमग को उनकी उपलब्धियों के लिए सम्मानित भी किया गया ।
काव्यसंध्य का शुभारंभ पूर्वांचल के कोहनूर शायर सलीम बस्तवी अज़ीज़ी की नात ए पाक एवं ख्यातिलब्ध कवित्री अर्चना श्रीवास्तव की वाड़ी वंदना के साथ हुआ । तदोपरांत युवा शायर शाद अहमद ने अपने कलाम से वर्तमान समय पर करारी चोट की अपने इस कलाम के साथ,
ध्यान दो साहब के दिन अच्छे नहीं,
कब पता झोला उठाकर चल दिए ।
इसी क्रम में शायर सुशील सिंह पथिक ने अपनी भरपूर संजीदगी का एहसास कराया इस शेर के साथ,
क्या करेगा आरज़ू इसके सिवा,
एक भूखे को निवाला चाहिए ।
गीतकार राजेंद्र सिंह राही का अंदाज़ यह रहा,
हो रहे कमज़ोर रिश्ते हम कहाँ पर जा रहे,
क्यों अंधेरे बेबसी के अब घरों में छा रहे।
ख्यातिलब्ध शायर विनोद कुमार हर्षित ने खूब समां बांधा अपने इस मयारी कलाम के साथ,
हर तरफ शोर मचा रक्खा है तौबा तौबा,
एक ज़ालिम ने डरा रक्खा है तौबा तौबा ।
इसी के साथ मशहूर ओ मारुफ शायर सलीम बस्तवी अज़ीज़ी ने कई दमदार कलाम से सामईन को बाग़ बाग़ कर दिया, खासकर उनका यह कलाम,
,, जिसको पढ़कर इस दुनिया की आँखें फिर हों जाएँ नम,
उस प्रेमचन्द के जैसा इक गोदान कहाँ से लाऊँ मैं,,, के ज़रिए अपनी उत्कृष्टता का परिचय दिया।
इसी फेहरिस्त में कवित्री अर्चना श्रीवास्तव ने अपनी रूमानियत से खूब दाद ओ तहसीन हासिल किया इस शेर के साथ,
तुम्हें अपना बनान चाहती हूं,
मोहब्बत आजमाना चाहती हूं ।
कार्यक्रम के संयोजक दीपक प्रेमी ने भी अपने खूबसूरत तरन्नुम से सभी का दिल जीत लिया,
नज़र काफ़िर निशाना हो गया है,
यह दिल फिर से दीवाना हो गया है ।
इसी क्रम में कार्यक्रम के आयोजक अफजल हुसैन अफजाल ने भी खूब समां बांधा अपने इस कलाम के साथ,
आज शब चाँद मेरे घर में ठहर जाने दो,
अपनी ज़ुल्फ़ों के तले रात गुज़र जाने दो ।
इसी के साथ लगभग आधा दर्जन रचनाकारों ने अपने अपने काव्य पाठ से उपस्थित श्रोताओं का मन मोह लिया,
सागर गोरखपुरी,,,,
सागरों से तो हुआ करते हैं दरिया अच्छे,
वोह किसी प्यासे की तो प्यास बुझा देते हैं।
मुख्य अतिथि डॉक्टर वी के वर्मा,,,
होरी का तो आज भी है प्रतिकूल नक्षत्र,
प्रेम धन के पात्र हैं यत्र तत्र सर्वत्र ।
अनवर हुसैन पारसा,,,,
मैं कह रहा हूँ मुनाफिक पे ऐतबार न कर,
हुई जो जंग तो पीछे से भाग जाएगा ।
राहुल चौहान,,,,
मुहब्बत की पहली शर्त कामयाब होना है,
तब कहीं जाके इश्क लाजवाब होना है।
और अंत में अध्यक्षता कर रहे राष्ट्रीय कवि डॉ राम कृष्ण लाल जगमग ने अपनी कई उत्कृष्ट कविताओं द्वारा मंच को ऊंचाई प्रदान की,
साहब से मत कीजिए कोई आप सवाल,
वर्ना होगा आपका बड़ा भयंकर हाल।