अयोध्या में गुरु पूर्णिमा से शुरू हुआ झूला महोत्सव, संत ने बताया इसका अलौकिक धार्मिक महत्व

 

महेन्द्र कुमार उपाध्याय
अयोध्या। रामनगरी अयोध्या में गुरु पूर्णिमा का पर्व अत्यंत धार्मिक उत्साह और उल्लास के साथ मनाया गया। यह पावन दिन महर्षि वेद व्यास जी की जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। इस अवसर पर कौशलेश सदन विद्या भास्कर संत स्वामी वासुदेवाचार्य महाराज ने अयोध्या की विशेष परंपराओं और गुरु के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। गुरु का स्थान सर्वोपरि स्वामी वासुदेवाचार्य स्वामी वासुदेवाचार्य जी महाराज ने मीडिया से बातचीत करते हुए कहा, सुखदेव की भागवत कथा सर्वत्र चल रही है। भगवान श्री कृष्ण और बलराम को ‘रामानुज’ कहा जाता है। वेद व्यास जी ने वेदों का विस्तार किया था, इसलिए उनकी जन्मतिथि को गुरु पूर्णिमा के रूप में हम सब मनाते हैं। नास्तिक हो या आस्तिक, गुरु का अस्तित्व सभी स्वीकार करते हैं। इसलिए गुरु की पूजा करना सबका दायित्व है। गुरु पूर्णिमा से जन्माष्टमी तक झूला महोत्सव की अनूठी परंपरा अयोध्या की अनूठी और प्राचीन परंपरा का जिक्र करते हुए स्वामी जी ने बताया कि गुरु पूर्णिमा के पावन दिन से ही अयोध्या के मंदिरों में ठाकुर जी के लिए झूले सज जाते हैं।
अवधि: गुरु पूर्णिमा से लेकर श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर्यंत (महीने भर या सवा महीने तक) ठाकुर जी झूले पर विराजमान होते हैं।
मणि पर्वत का झूला: हरियाली तीज की तृतीया तिथि से मणि पर्वत के लिए भगवान का झूला उत्सव प्रारंभ होता है।
दिव्य संगीत: जिन मंदिरों में सवा महीने तक झूला चलता है, वहां रसिक संतों द्वारा रचे गए विशेष पदों का गायन किया जाता है। ये वही पद हैं जो उन संतों ने रचे हैं जिन्होंने भगवान का प्रत्यक्ष अनुभव किया है। प्रमुख तिथियां और मान्यता स्वामी वासुदेवाचार्य जी ने बताया कि 15 अगस्त से अयोध्या के कई प्रमुख मंदिरों में झूला महोत्सव का भव्य शुभारंभ होगा, जबकि स्वामी जी से जुड़े विशेष कार्यक्रम 14 अगस्त से आयोजित किए जाएंगे। धार्मिक मान्यता अयोध्या में ऐसी प्रगाढ़ मान्यता है कि “झूला झूलते हुए ठाकुर जी का दर्शन करने वाले को दूसरा जन्म नहीं मिलता।
इस महोत्सव को देखने और भगवान के दर्शन के लिए देश-विदेश से बड़ी संख्या में श्रद्धालु रामनगरी अयोध्या पहुंच रहे हैं।