मशहूर मारूफ शायर अफसाना निगार उपन्यासकार डॉ वसीउल हक़ “वसी” के सम्मान में आयोजित हुआ कवि सम्मेलन एवं मुशायरा

बस्ती उर्दू अदब उसके मशहूर मारूफ शायर अफसाना निगार उपन्यासकार डॉ वसीउल हक़ “वसी” के सम्मान में फारूक ए आज़म पब्लिक स्कूल मोहल्ला मिल्लत नगर गांधीनगर बस्ती में आयोजित हुआ जिसकी अध्यक्षता उस्ताद शायर ताज़ीर बस्तवी व संचालन वरिष्ठ गीतकार डॉ विनोद उपाध्याय हर्षित ने किया
विशिष्ट अतिथि के रूप में का डॉ रामकृष्ण लाल “जगमग जी” ने कहा डॉ वसीउल हक “वसी” साहब जैसी शख्सियत का उर्दू अदब में होना उर्दू अदब के लिए सम्मान की बात हैअभी हाल ही में डॉ वसी साहब की दो कृतियों का विमोचन हुआ जिसमे एक पुस्तक “ख्वाब मंजिल” (उपन्यास उर्दू में) दूसरी पुस्तक “टूटती सांसों के दरमियान” (कहानी संग्रह उर्दू में) हुई बहुत ही बेहतरीन किताब है तदुपरांत जगमग जी ने अपनी कविताओं से लोगों को भाव विभोर किया
अपने और पराये का कुछ ज्ञान नहीं था,
सच कहता हूं यह रिश्ता आसान नहीं था,
एक झलक में तुम्हें देवता माना मैंने
तुम पत्थर निकलोगे यह अनुमान नहीं था
अध्यक्षता कर रहे उस्ताद शायर ताजिर बस्तवी ने अपनी गंभीर रचनाओं से माहौल को नई दिशा दी
आकेबत के लिए कुछ भी सोंचा नहीं,
आप दुनिया में आकर के बस खो गए,
मिस्ले जन्नत बनाया है घर आपने,
आप तो जीते जी जन्नती हो गये,
साहबे दीवान शायर वसीम खान “वसीम” रूमानी शेर पढ़कर माहौल को खुशगवांर बनाया – जब से तस्वीर तेरी दिल में बसाई हुई है , तब से दुनिया मेरी नजरों में पराई हुई है जनाब सुम्बुल गोरखपुरी साहब बेहतरीन शेर माहौल में नई ताजी की पैदा की – क्या मिले उसे मंजिल पल में जो बदलता है , ज़र्फ़ रखने वाला ही आसमा पर चलता है, वरिष्ठ गीतकार डॉ विनोद उपाध्याय हर्षित ने कहा कि – नसीब में जो लिखे हैं कहां ओ टलते हैं , किसी की चाह से मौसम नहीं बदलते हैं, क्षमा कर माहौल को और खूबसूरत बनाया, काशी अनवर पाशा साहब को क्यों कहा- हाय मेरी सुबह शाम गर्दिश में, है ये सारा निजा़म गर्दिश में, डॉक्टर अफ़ज़ल हुसैन अफ़ज़ल ने कहा कि- सितमगरी कभी उस शख्स की सज़ा न लगे, दगा वो अल्लाह करे फिर भी बेवफा न लगे, मैं छोड़ आया हूं बच्चों को शहर में लेकिन, खुदा करे कि नये दौर की हवा ना लगे,
सागर गोरखपुर ने कुछ यूं कहा- अब तो उसको भी काम होता है, जिसकी थैली में दम होता है
डॉ राजेंद्र सिंह रही- बंदर अदरक का नहीं कभी जनता स्वाद, इसीलिए गुणराशि को कर देता बर्बाद,
युवा शायर दीपक सिंह प्रेमी ने कहा- हमारी भावनाओं का सुखद संसार तुमसे है, तुम्ही से पर्व हैं सारे सभी त्योहार तुमसे हैं, कई जन्मों से मेरा तन मुझे शापित सा लगता है, चली आओ मुझे छूलो मेरा उद्धार तुमसे है,
डॉ पारस वैद्य ने कहा – तुम थे तो ऐसा लगता था मरुथल भी हरियाली है
एक तुम्हारे न होने से जीवन कितना खाली है ।
सागर गोरखपुर ने कुछ यूं कहा- अब तो उसको भी काम होता है, जिसकी थैली में दम होता है
डॉ राजेंद्र सिंह रही- बंदर अदरक का नहीं कभी जनता स्वाद, इसीलिए गुणराशि को कर देता बर्बाद,
युवा शायर दीपक सिंह प्रेमी ने कहा- हमारी भावनाओं का सुखद संसार तुमसे है, तुम्ही से पर्व हैं सारे सभी त्योहार तुमसे हैं, कई जन्मों से मेरा तन मुझे शापित सा लगता है, चली आओ मुझे छूलो मेरा उद्धार तुमसे है,
डॉ पारस वैद्य ने कहा – तुम थे तो ऐसा लगता था मरुथल भी हरियाली है
एक तुम्हारे न होने से जीवन कितना खाली है ।
सुशील सिंह पथिक ने कहा कि- ख़ुद अपने राज़ से पर्दा उठा दिया मैंने
किसी को नाम तुम्हारा बता दिया मैंने, तमाम जुगनुओं की रौशनी के साये में,चराग़ सोच समझकर बुझा दिया मैंने
ओम प्रकाश गौतम ने कुछ यूं कहा- जो ना मिले जमीं पे, समंदर तलाश कर ।
मस्जिद तलाश लो, या तो मंदर तलाश कर ।
इस अवसर पर फारूक अहमद फारूक वसीम नेवी अपनी ग़ज़ल से लोगों को भाव विभोर किया, राजेंद्र श्रीवास्तव राजेश मोहम्मद अरमान मोहम्मद कामरान नियाज अफसर आदि लोग उपस्थित रहे