ग़ज़ल
उकता चुके हैं आपके हम इम्तेहान से,
करती है तबीयत की गुज़र जायें जान से।
उस दिन का इंतेज़ार है कितना न पूछिए,
उतरेंगे आप जिस घड़ी अपनी मचान से।
नफ़रत के ताजिरों ने ने कुछ इस तरह बोइ फ़स्ल,
बू आती है बारूद की अब ज़ाफ़रान से।
कानो में शहद घोलती थी जिसकी गुफ़्तुगू,
सीसा टपक रहा है अब उसकी ज़बान से।
बेटों की उसने कुछ न सुनी लौट आई गाँव,
इतना लगाव था उसे कच्चे मकान से।
ईमान उनका देखिए उनको यकीन है,
उतरेगी किसी रोज़ मदद आसमान से।
फूलों का कारोबार था जिनका नदीम,वो,
त्रिशूल बेचते हैं अब अपनी दुकान से।
नदीम अब्बासी “नदीम”
गोरखपुर॥