रोज़गार का संकट और टूटता युवा आत्मविश्वास

 

आज का युवा ऊर्जा, सपनों और संभावनाओं से भरा हुआ है, किंतु उसके सामने खड़ी सबसे बड़ी चुनौती है—रोज़गार का संकट। यह संकट केवल बेरोज़गारी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस आत्मविश्वास को भी धीरे-धीरे तोड़ रहा है, जो किसी भी राष्ट्र की प्रगति की सबसे मज़बूत नींव होता है। डिग्रियों से भरे हाथ, प्रतियोगी परीक्षाओं की लंबी तैयारी और अनिश्चित भविष्य—यही आज के युवा की पहचान बनती जा रही है।
स्वतंत्रता के बाद से ही भारत ने युवाओं को अपनी शक्ति माना है। जनसंख्या का बड़ा हिस्सा युवा है, जिसे “जनसांख्यिकीय लाभांश” कहा जाता है। किंतु जब यही युवा रोज़गार के अभाव में निराश होता है, तब यह लाभांश धीरे-धीरे बोझ में बदलने लगता है। आज स्थिति यह है कि शिक्षित युवाओं की संख्या बढ़ रही है, पर उनके लिए उपयुक्त अवसर कम होते जा रहे हैं।
रोज़गार के संकट का पहला कारण हमारी शिक्षा व्यवस्था में निहित है। शिक्षा आज भी ज्ञान-केंद्रित अधिक और कौशल-केंद्रित कम है। कॉलेजों और विश्वविद्यालयों से निकलने वाले विद्यार्थी पुस्तकीय ज्ञान तो रखते हैं, किंतु व्यवहारिक दक्षता का अभाव उनके आत्मविश्वास को कमज़ोर कर देता है। परिणामस्वरूप, वे नौकरी के बाज़ार में स्वयं को अयोग्य महसूस करने लगते हैं।
दूसरी ओर, प्रतियोगी परीक्षाओं का बढ़ता दबाव युवाओं को मानसिक रूप से थका रहा है। वर्षों की तैयारी के बाद भी जब सफलता हाथ नहीं लगती, तो आत्म-संदेह जन्म लेता है। बार-बार असफलता का सामना करता युवा स्वयं को दोषी मानने लगता है, जबकि समस्या व्यक्तिगत नहीं, बल्कि संरचनात्मक होती है। यह स्थिति अवसाद, चिंता और आत्मग्लानि को जन्म देती है, जो समाज के लिए गंभीर चेतावनी है।
आर्थिक परिवर्तन और तकनीकी विकास ने भी रोज़गार की प्रकृति को बदला है। ऑटोमेशन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने अनेक पारंपरिक नौकरियों को सीमित कर दिया है। नई नौकरियाँ पैदा तो हो रही हैं, पर वे उच्च कौशल की माँग करती हैं, जिसके लिए अधिकांश युवा तैयार नहीं हैं। इस असंतुलन का सीधा प्रभाव युवा आत्मविश्वास पर पड़ता है।
ग्रामीण और शहरी युवाओं के बीच असमानता भी इस संकट को गहरा करती है। ग्रामीण क्षेत्रों में रोज़गार के अवसर सीमित हैं, जबकि शहरों में प्रतिस्पर्धा अत्यधिक। ऐसे में युवा न तो गाँव में टिक पाता है, न शहर में स्थिर हो पाता है। यह अस्थिरता उसके मन में निरंतर असुरक्षा का भाव भर देती है।
सरकारी नीतियाँ और योजनाएँ इस दिशा में प्रयासरत अवश्य हैं, किंतु उनका प्रभाव सीमित दिखाई देता है। स्वरोज़गार और स्टार्टअप को बढ़ावा देने की बात तो होती है, पर ज़मीनी स्तर पर संसाधनों, मार्गदर्शन और वित्तीय सुरक्षा का अभाव युवाओं को जोखिम उठाने से रोकता है। परिणामस्वरूप, वे सुरक्षित नौकरी की तलाश में वर्षों गँवा देते हैं।
इस पूरे परिदृश्य का सबसे चिंताजनक पक्ष है—टूटता आत्मविश्वास। आत्मविश्वास ही वह शक्ति है, जो युवा को संघर्ष के बीच भी आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। जब यह टूटता है, तो युवा केवल नौकरी ही नहीं, अपने सपनों से भी समझौता करने लगता है। यह समझौता किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे समाज का नुकसान है।
फिर भी, आशा की किरण पूरी तरह बुझी नहीं है। यदि शिक्षा को कौशल-आधारित बनाया जाए, उद्योग और शिक्षा के बीच संवाद बढ़े, तथा युवाओं को मानसिक और सामाजिक समर्थन मिले, तो यह संकट अवसर में बदला जा सकता है। युवा केवल नौकरी चाहने वाला नहीं, बल्कि नौकरी देने वाला भी बन सकता है—बशर्ते उसे सही दिशा और विश्वास मिले।
अंततः, रोज़गार का संकट केवल आर्थिक समस्या नहीं है, यह सामाजिक और मानसिक समस्या भी है। जब तक हम युवा आत्मविश्वास को पुनः सशक्त नहीं करेंगे, तब तक विकास अधूरा रहेगा। एक सशक्त राष्ट्र के लिए आवश्यक है कि उसका युवा स्वयं पर विश्वास करे—और यह ज़िम्मेदारी समाज, व्यवस्था और नीति-निर्माताओं सभी की है।
रश्मि मीना ( हिन्दी लेखिका )
जयपुर, राजस्थान
8824419529