शब्दों का जादू – ज्योती वर्णवाल 

विषय-शब्दों का जादू

विद्या-कविता

 

शब्दों का जादू न पूछो तुम,

नारी की पीड़ा न पूछो तुम।

शब्दों के खेल ने ही तो उसे,

बचपन की चौखट पर घेरा था।

जब वो छोटी थी, माँ-बाबा के आँगन में,

खुलें आसमान में पंख फैलाए उड़ती थी,

मीठी बातों से घर के कोने-कोने में,

वो खुशियाँ अपनी बिखेरती थी।

पर शब्दों का जादू तब कुछ और था,

माँ कहती— “इतनी ज़ोर से मत हँस,

क्या कहेंगे लोग? जहाँ तू जाएगी।”

फिर एक दिन वो चिड़िया ब्याह दी गई,

ससुराल वालों ने शब्दों का ऐसा मोहपाश बुना,

कि वो उसी घर-परिवार की होकर रह गई।

फिर एक दिन ऐसी आँधी आई,

शब्दों का जादू फिर से चला।

घर में ‘कंस’ रूपी अपनों का प्रवेश हुआ,

और कड़वे बोलों के तीर छोड़े गए।

जो घर कभी इत्र की तरह महकता था,

वहाँ सब बेघर और बेगाने हो गए।

एक शिकारी आया, मीठी बातों का जाल बिछाया,

ऐसा शब्दों का जादू चलाया—

कि चिड़िया का बसा-बसाया घर उजाड़ दिया।

वो चिड़िया आज भी इंतज़ार में है,

अपने उस पुराने घोंसले की तलाश में है,

जहाँ सारा परिवार एक साथ रहता था,

और जहाँ शब्दों के जादू से ही उसका आशियाना महकता था।

 

ज्योती वर्णवाल

नवादा (बिहार)

मेरी स्वरचित रचना