वो मुझ से फिर उलझना चाहता है,
मुकम्मल अब बिखरना चाहता है।
हसद इतनी मेरी परवाज़ से है,
वो मेरे पर कतरना चाहता है।
ये कैसा शोर बरपा हर तरफ़ है,
कि पत्थर भी पिघलना चाहता है।
दवा का अब असर कुछ भी न होगा,
परिंदा अब तो उड़ना चाहता है।
झलक दस्तार की क्या देखी उसने,
गवाही से मुकरना चाहता है।
ज़माना भी तो समझे दर्द उसका,
वो अब थोड़ा छलकना चाहता है।
हदों की हद में ख़ुद को कितना रख्खें,
कि दिल हद से गुजरना चाहता है।
नदीम औक़ात उस कछुए की देखो,
मगर को जो निगलना चाहता है।
नदीम अब्बासी ‘नदीम’
गोरखपुर॥