भाग न पीछे मृगतृष्णा के, क्षनिक खेल सब मेला है।
रह जाता सब यही धरा पे, यही जीवन का खेला है।।
प्रभु सुमिरन कर लो मानव, यही संग में जाना है।
सत्य राह पर चल कर देखो, सार खुशी का माना है।।
तेरा मेरा करो नहीं अब, छोड़ो ठेलम ठेला है
भाग न पीछे मृग तृष्णा के, क्षनिक खेल सब मेला है।
क्या तुम लेकर आए मानव, खाली ही तो जाना है।
एक दूजे का मान करो अब, प्रेम सभी से पाना है।।
जिस ने लूटा अपनों को तो, दुख को वह तो झेला है
भाग न पीछे मृगतृष्णा के, क्षणिक खेल सब मेला है।।
पैसा पैसा मत कर प्यारे, क्यों इतना इतराता है।
माया मोह का छोड़ प्यारे, झूठा सारा नाता है।।
बीत रहा है पल पल देखो, जाना सबको अकेला है
भाग न पीछे मृगतृष्णा के, क्षणिक खेल सब मेला है।।
अंजना सिन्हा “सखी ”
रायगढ़