जीवन का सबसे बड़ा पुरुषार्थ स्वयं को श्रेष्ठ बनाना, आत्मपरिष्कार ही संसार का सबसे बड़ा लाभ : प्रो. डॉ. नवीन सिंह

जीवन का सबसे बड़ा पुरुषार्थ स्वयं को श्रेष्ठ बनाना, आत्मपरिष्कार ही संसार का सबसे बड़ा लाभ : प्रो. डॉ. नवीन सिंह

 

आस्था से बनता है व्यक्तित्व, विचारों से निर्धारित होती है जीवन की दिशा; सकारात्मक मनःस्थिति और सत्कर्मों से संभव है जीवन में परिवर्तन

लवकुश सिंह संवाददाता

अनुराग लक्ष्य न्यूज बस्ती

बस्ती। जीवन की वास्तविक सफलता केवल धन, पद, प्रतिष्ठा और भौतिक सुख-सुविधाओं की प्राप्ति में नहीं, बल्कि अपने व्यक्तित्व को उत्कृष्ट बनाने, विचारों को परिष्कृत करने तथा जीवन को श्रेष्ठ उद्देश्यों के लिए समर्पित करने में निहित है। जीवन का सबसे बड़ा पुरुषार्थ स्वयं को बेहतर बनाना और संसार का सबसे बड़ा लाभ अपने भीतर सद्गुणों, सद्विचारों तथा सद्कर्मों का विकास करना है। यह विचार प्रोफेसर डॉ. नवीन सिंह ने व्यक्त करते हुए आत्मपरिष्कार को सफल एवं सार्थक जीवन का प्रमुख आधार बताया।

 

उन्होंने कहा कि मनुष्य का व्यक्तित्व उसकी आस्था, श्रद्धा, आकांक्षाओं और व्यवहार से निर्मित होता है। हमारी आस्थाएं धीरे-धीरे आदतों का रूप लेती हैं और जब आदतें स्थायी हो जाती हैं, तब वे स्वभाव बन जाती हैं। इसी प्रकार निरंतर किए जाने वाले अच्छे अभ्यास सद्गुणों के रूप में विकसित होते हैं। मनुष्य अपनी आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए शरीर और मन से जो प्रयास करता है, वही कर्म कहलाता है। इसलिए व्यक्ति के विचार, आचरण और अभ्यास उसके व्यक्तित्व को दिशा प्रदान करते हैं।

 

सुख-दुःख में परिस्थितियों से अधिक महत्वपूर्ण है मनःस्थिति

 

प्रो. डॉ. नवीन सिंह ने कहा कि सामान्यतः मनुष्य अपनी प्रसन्नता और उद्विग्नता का कारण बाहरी परिस्थितियों को मानता है। अनुकूल परिस्थितियों में वह प्रसन्न होता है, जबकि प्रतिकूल परिस्थितियों में निराशा से घिर जाता है। वास्तविकता यह है कि किसी घटना का प्रभाव केवल उस घटना पर ही नहीं, बल्कि उसके प्रति व्यक्ति की मनःस्थिति, दृष्टिकोण और प्रतिक्रिया पर भी निर्भर करता है।

 

उन्होंने कहा कि संसार में सर्दी-गर्मी, जन्म-मरण, हानि-लाभ, सफलता-असफलता और अभाव-समृद्धि का क्रम निरंतर चलता रहता है। इन परिवर्तनों को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है, लेकिन इनके प्रति अपनी प्रतिक्रिया को विवेकपूर्ण और सकारात्मक बनाना मनुष्य के हाथ में है। एक ही परिस्थिति किसी व्यक्ति को निराश कर सकती है, जबकि दूसरा व्यक्ति उसी परिस्थिति से सीख लेकर आगे बढ़ने का रास्ता खोज लेता है। इसलिए मानसिक संतुलन, सकारात्मक चिंतन और आत्मविश्वास जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

 

आत्मपरिवर्तन के लिए दृढ़ संकल्प और निरंतर प्रयास आवश्यक

 

उन्होंने कहा कि पुरानी आदतों, कुसंस्कारों और नकारात्मक विचारों से मुक्त होकर अपने व्यक्तित्व को नया स्वरूप देना संभव है। इसके लिए व्यक्ति के भीतर परिवर्तन की सच्ची आकांक्षा, दृढ़ संकल्प और निरंतर प्रयास करने का साहस होना चाहिए। केवल दूसरों की सहायता अथवा परिस्थितियों के अनुकूल होने की प्रतीक्षा करने से स्थायी परिवर्तन नहीं आता। दूसरों का सहयोग मार्गदर्शन दे सकता है, लेकिन स्वयं को बदलने का उत्तरदायित्व व्यक्ति को ही निभाना पड़ता है।

 

उन्होंने आत्मचिंतन, अनुशासन, संयम, नियमित अभ्यास, सेवा और सदाचार को व्यक्तित्व निर्माण के प्रभावी साधन बताते हुए कहा कि अपनी कमियों को स्वीकार करना, गलतियों से सीखना और बुरी आदतों का त्याग करना आत्मविकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।

 

समाज और राष्ट्र के कल्याण से जुड़कर सार्थक बनता है जीवन

 

प्रो. डॉ. नवीन सिंह के अनुसार, मनुष्य को प्रतिदिन आत्ममंथन करना चाहिए कि उसने क्या सीखा, किसका भला किया, अपनी कौन-सी गलती सुधारी और व्यक्तित्व को बेहतर बनाने के लिए क्या प्रयास किया। जब जीवन का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत लाभ तक सीमित न रहकर परिवार, समाज और राष्ट्र के कल्याण से जुड़ जाता है, तब जीवन अधिक सार्थक बनता है।

 

उन्होंने कहा कि संसार की सबसे बड़ी संपदा धन-संग्रह नहीं, बल्कि धैर्य, विवेक, करुणा, सदाचार और सकारात्मक सोच जैसी आंतरिक शक्तियां हैं। जीवन का वास्तविक पुरुषार्थ अपनी कमजोरियों पर विजय प्राप्त करना, विचारों को श्रेष्ठ बनाना और अपने कर्मों से समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाना है। आत्मपरिष्कार की यही साधना मनुष्य को परिस्थितियों का दास बनने के बजाय अपने जीवन का निर्माता बनाती है।