मुंसिफ़ी का हाल क्या है देख लो अख़बार में,
किस क़दर सहमी खड़ी है आज वो दरबार में।
आ के आँसू उनके पोछें उनके दुखड़ों को सुने,
आज के दिन कोई भी ऐसा नहीं सरकार में।
पूछ ले उन से कि क्यों कर ये हुआ,कैसे हुआ,
इतनी हिम्मत भी नहीं है देख लो सरदार में।
सांस की हरकत है ये,या रूह की परवाज़ है,
ज़िन्दगी की कोई लौ दिखती नहीं बीमार में।
मसअले की जड़ में जा के ढूँढो इसकी वजह तुम,
कैसे कश्ती आ गई इंसाफ़ की मझधार में।
उजली उजली इनकी पोशाको पे मत जाओ मियां,
हैं मुल्लब्विस खादीयाँ नफ़रत के कारोबार में।
कौन सच्चा कौन झूठा छोड़ दो दिल्ली पे अब,
क्यों नदीमुल्लाह उलझे हो तुम इस तक़रार में।
नदीम अब्बासी “नदीम”
गोरखपुर॥