जहाँ बदला मगर इस मुल्क के रहबर नहीं बदले, सलीम बस्तवी अज़ीज़ी,,,,,,,,

अनुराग लक्ष्य, 11 अक्टूबर
दोस्तों आप सभी को सलीम बस्तवी अज़ीज़ी का प्यार भरा आदाब, आप लोगों ने मुझ फ़कीर को बहोत प्यार, दुलार और सम्मान दिया है। जिसका मैं हमेशा क़र्ज़दार रहूंगा। इसी प्यार और दुलार की बदौलत आपसे कुछ गुफ्तगू करने की हिम्मत जुटा पाया हूँ ।
चूंकि हम शायर हैं, अदीब हैं, कलमकार हैं और समाज का आईना भी, साथ ही इस मुल्क की अवाम भी। इस बिना पर हमें पूरा हक़ और अधिकार है, कि इस मुल्क के बनने और संवरने पर हम अपनी प्रतिक्रिया से आपको रूबरू करा सकें, साथ ही इस बात से भी आगाह कर सकें कि हमारे मुल्क का नेज़ाम आज की तारीख़ में कहाँ जा रहा है।
दिल रोता है आँखें नम हो जाती है हैं, जब कुछ राक्षसी प्रवृत्तियाँ इस मुल्क के अमन चैन और इंसानियत को लुलुहान करती हुई नज़र आती हैं। तो आँखों में शोले हृदय में ज्वालामुखी फूट पड़ते हैं।
पर, अफसोस सद् अफसोस दूर दूर तक उम्मीद की कोई किरण नज़र नहीं आती, कि इस मुल्क का बिगड़ा निज़ाम कैसे सुधरेगा। जिसमें हर हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई अपने अपने ख़्वाबों के साथ अपनी ज़िंदगी गुज़ार सके।
बस, मुझे आपसे इतनी ही गुज़ारिश करनी है, इतना ही निवेदन करना है कि आप अपनी शायरी और कविताओं को उस रास्ते पर ले आएँ, जो मुल्क का आईना बनकर इस मुल्क को वोह भारत बनाएं, जिसे हम कभी सोने की चिड़िया के नाम से जानते थे।
अन्त में इस मुल्क के बिगड़े निज़ाम पर बहोत अफ़सोस के साथ यह यह चार मिसरे आपकी समाअतों के हवाले कर रहा हूँ कि,
” जहाँ बदला मगर इस मुल्क के रहबर नहीं बदले
ज़बाँ बदली मगर हाथों के वोह ख़ंजर नहीं बदले
वही दहशत वही साज़िश वही खूंरेज़ी का आलम
कभी इस मुल्क के हालात और मंज़र नहीं बदले”