अनुराग लक्ष्य, 3 अक्टूबर
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी
मुम्बई संवाददाता ।
यूँ तो शायरी ने हमेशा समाज में एकजुटता भाई चारा और समानता स्थापित किया है लेकिन आज जिस तरह की शायरी हिंदुस्तानी अदब के गलियारों में हो रही है। वोह कुछ सोचने पर मजबूर करती है। कुछ ऐसे शायर भी मंज़र ए आम हो गए हैं। जिनका अदब और साहित्य से दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं है।
खुशी की बात है कि ऐसे ही माहौल में कुछ सच्चे शायर भी ज़िन्दा हैं जो अपनी ज़मीन पर खरे और सच्चे हैं। आज ऐसे ही एक ऐसे संजीदा शायर की ग़ज़ल आप तक पहुंचा रहा हूँ, दुनिया ए अदब जिसे साहिल प्रतापगढ़ी के नाम से जानती और पहचानती है।
ज़रा ठहरो गया कह कर वो वादे पर नहीं आया,
अभी तक मुन्तज़िर हूॅं मैं, मेरा दिलबर नहीं आया ।
मेरे पैरों में छाले हैं थकन से चूर हूॅं बिल्कुल,
मुसाफिर ही रहा हरदम कि मेरा घर नहीं आया ।
शहर है क़ातिलों का ये यहाॅं ऐसा नहीं कोई,
जो अपने हाथ में खंजर खुला लेकर नहीं आया ।
चला दरिया ही मिलने को सदा मग़रूर सागर से,
मगर दरिया से मिलने को कभी सागर नहीं आया ।
कोई ये कह नहीं सकता हमारे दरम्याॅं या रब !,
हिदायत के लिए तेरा तो पैग़म्बर नहीं आया ।
अजब है रहबरी उसकी इलेक्शन में वो जो जीता,
ग़रीबों की कभी बस्ती में फिर रहबर नहीं आया ।
बता दो दुश्मनों को तुम नहीं लाचार है *साहिल*,
फ़क़त मैदान में अब तक कभी खुलकर नहीं आया ।
,,,,,,,,पेशकश, सलीम बस्तवी अज़ीज़ी ,,,,,,,