पुस्तक समीक्षा
“मेरे राम, सबके राम”’ -लोकमंगल की ओर उन्मुख संवेदनशील काव्य-संग्रह
~समीक्षक – डॉ अवनीश मिश्र निर्झर
सुधीर श्रीवास्तव का काव्य-संग्रह ‘मेरे राम, सबके राम’ केवल रामभक्ति का अभिव्यक्ति-पत्र नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना, सामाजिक चेतना, पारिवारिक संबंधों, राष्ट्रीय भावना और जीवन-मूल्यों का बहुआयामी दस्तावेज है। संग्रह में 82 रचनाएँ हैं, जिनमें राम, हनुमान, माँ शारदे, अयोध्या और भारतीय संस्कृति से जुड़े आध्यात्मिक भावों के साथ-साथ नारी, पर्यावरण, पिता, रिश्ते, आजादी, आधुनिकता, सामाजिक विसंगतियाँ और मानवीय संघर्ष जैसे समकालीन विषय भी उपस्थित हैं।
पुस्तक का शीर्षक ही इसकी मूल जीवन-दृष्टि को उद्घाटित करता है—राम किसी एक व्यक्ति, वर्ग या समुदाय के नहीं, बल्कि मर्यादा, करुणा, धैर्य और सत्य के सार्वभौम प्रतीक हैं। ‘सहिष्णुता के सागर-श्रीराम’, ‘राम जीवन मंत्र है’, ‘सबके राम’, ‘मेरे राम’ तथा ‘अयोध्या से अयोध्याधाम’ जैसी रचनाएँ राम के आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक व्यक्तित्व को समकालीन संदर्भों से जोड़ती हैं।
संग्रह की उल्लेखनीय विशेषता इसकी सरल, सहज और आत्मीय भाषा है। व्यक्तिगत अनुभवों और जीवन-संघर्षों ने कवि की अभिव्यक्ति को लोक-संवेदना प्रदान की है। सामाजिक सरोकारों वाली रचनाओं में नारी-सम्मान, कन्या-भ्रूण हत्या, पर्यावरण, संविधान, रोटी और आधुनिक जीवन की विडंबनाओं पर सजग दृष्टि दिखाई देती है।
साधनावादी दृष्टि से देखें तो संग्रह में आत्मानुभूति, मानवीय मूल्य, सांस्कृतिक चेतना, नैतिकता और लोकमंगल के तत्त्व पर्याप्त रूप से दिखाई देते हैं। कवि का राम अंततः मनुष्य के भीतर मर्यादा और सद्भाव जगाने वाला राम है। यही इस कृति की सार्थकता है। कुल मिलाकर ‘मेरे राम, सबके राम’ भक्ति, संवेदना और सामाजिक सरोकारों का ऐसा संग्रह है जो पाठक को आत्मचिंतन के साथ जीवन-मूल्यों की ओर उन्मुख करता है।
सोनिया विहार, दिल्ली