पुस्तक समीक्षा -‘मेरे राम सबके राम’
समीक्षक- संजीव कुमार भटनागर
डॉ. सुधीर श्रीवास्तव कृत काव्य-संग्रह ‘मेरे राम सबके राम’ केवल एक काव्य-पुस्तक नहीं, बल्कि समकालीन युग में लोक-आस्था, मर्यादा, भक्ति और सामाजिक संवेदनाओं का एक अनुपम दस्तावेज है। 163 पृष्ठों में समेटे गए इस संग्रह की 89 कविताएँ पाठक को राम-काव्य की उस अविरल धारा से जोड़ती हैं, जो व्यक्तिगत भक्ति से उठकर सार्वभौमिक सत्य की ओर अग्रसर होती है।
पुस्तक का पावन समर्पण संत-परंपरा के प्रतीक महात्मा बनादास जी महाराज एवं पं. शोभानाथ तिवारी जी को किया गया है, जो इस कृति के नैतिक और आध्यात्मिक धरातल को मजबूती प्रदान करता है। पुस्तक में लेखक परिचय के साथ-साथ डॉ. अमरेंद्र कुमार वर्मा जी की विचारोत्तेजक भूमिका सम्मिलित है। इसके अतिरिक्त, गिरीश पाण्डेय ‘काशिकेय’ जी ने इस कृति को “भावनाओं का जीवंत दस्तावेज” और सुप्रसिद्ध कवि अनिल राही जी ने इन कविताओं को “समाज की दिशा और दशा बदलने में सक्षम रचनाएँ” निरूपित किया है।
संग्रह का शुभारंभ सनातन परंपरा के अनुरूप ‘माँ शारदा की स्तुति’ तथा ‘जय हनुमान’ की पावन वंदना से होता है। इसके उपरांत राम-कथा, अयोध्या के नव-पुनर्जागरण और जीवन दर्शन से जुड़ी काव्य-यात्रा आरंभ होती है।
पुस्तक का मुख्य स्वर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के प्रति अगाध श्रद्धा और अयोध्या धाम के भव्य नवनिर्माण पर केंद्रित है। ‘राम आएँगे’, ‘सहनशीलता के सागर – श्री राम’, तथा ‘श्री राम जी घर आएँगे’ जैसी रचनाओं में राम के शील, करुणा और धैर्य के गुणगाथा का सहज वर्णन है।
‘अयोध्या से अयोध्याधाम’, ‘प्राण प्रतिष्ठा और राम की माया’, ‘राम मंदिर निर्माण का सपना साकार’ एवं ‘राम को निज धाम मिल गया’ जैसी कविताएँ भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण और जन-जन की सदियों पुरानी आकांक्षाओं के पूर्ण होने का उल्लसित चित्रण करती हैं। यहाँ ‘राम’ केवल एक ऐतिहासिक या धार्मिक पात्र नहीं, बल्कि ‘आस्था का नाम राम’ और ‘राम जीवन मंत्र है’ के माध्यम से जीवन के सर्वांगीण दर्शन बन जाते हैं।
डॉ. सुधीर श्रीवास्तव की लेखनी केवल भक्ति-भाव तक सीमित नहीं रहती; वह जीवन के व्यावहारिक और यथार्थवादी पक्षों को भी पूरी प्रखरता से छूती है। ‘सिक्के के दो पहलू’, ‘मौन व्रत तोड़ दूंगा’, ‘भावनात्मक शक्ति’, और ‘मेरी उलझन’ जैसी कविताएँ मानव मन के द्वंद्व, अंतर्मन की वेदना और मुखरित होते विरोध को आवाज देती हैं। ‘रिश्ते निभाना जानता हूँ’ और ‘पुनर्जन्म का नव अनुबंध’ जैसी रचनाएँ मानवीय संबंधों के प्रति संवेदनशीलता और प्रतिबद्धता को रेखांकित करती हैं।
‘भारत माता की पुकार’ में ओजस्वी राष्ट्रप्रेम झलकता है, तो वहीं ‘होली यादगार मनाइए’ लोक-पर्व के उल्लास को सामाजिक समरसता से जोड़ती है। संग्रह की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और विचारणीय रचना ‘सृष्टि चक्र का संबंध नारी’ है। इसमें कवि ने नारी को केवल एक सामाजिक इकाई न मानकर उसे संपूर्ण सृष्टि की जननी, आधारशिला और चक्र-संचालक के रूप में स्थापित किया है। यह कविता आज के दौर में नारी-विमर्श को एक उदात्त और गरिमामयी धरातल प्रदान करती है।
डॉ. सुधीर श्रीवास्तव की भाषा अत्यंत सरल, प्रवाहपूर्ण, संप्रेषणीय और भावपूर्ण है। कविताओं में क्लिष्टता के स्थान पर आत्मीयता है, जिससे यह आम पाठक के हृदय में सीधे उतर जाती हैं। छंदबद्ध और छंदमुक्त दोनों ही शैलियों का सहज सामंजस्य इस संग्रह को विविधता और गेयता प्रदान करता है।
यूनिक फील पब्लिकेशन, मुम्बई द्वारा प्रकाशित ‘मेरे राम सबके राम’ काव्य-संग्रह आधुनिक हिंदी साहित्य और राम-काव्य परंपरा में एक उल्लेखनीय योगदान है। यह संग्रह पाठक को भक्ति रस में सराबोर करने के साथ-साथ अपने इतिहास, संस्कृति, मानवीय मूल्यों और सामाजिक कर्तव्यों के प्रति सचेत करता है। जैसा कि शीर्षक स्वयं स्पष्ट करता है—यह पुस्तक सिद्ध करती है कि राम किसी एक वर्ग, काल या परिधि के नहीं, बल्कि ‘सबके राम’ हैं।
साहित्य-प्रेमियों और राम-काव्य के अनुरागियों के लिए यह संग्रह एक पठनीय और संग्रहणीय कृति है।
लखनऊ, उत्तर प्रदेश