पूजा सेठ दिल्ली, अन्याय के खिलाफ उठी आवाज “जब मौन अन्याय की ताकत बन जाए”

 

महेन्द्र कुमार उपाध्याय
अयोध्या। समाज में अन्याय और अत्याचार केवल अपराधियों के बलबूते पर नहीं टिके रहते, बल्कि इसमें सबसे बड़ी भूमिका उन लोगों की चुप्पी निभाती है जो सब कुछ देखकर भी अनजान बन जाते हैं। हाल ही में इस विषय पर अपनी तीखी और संवेदनशील प्रतिक्रिया देते हुए पूजा सेठ, दिल्ली ने समाज की इस बड़ी कमजोरी पर करारा प्रहार किया है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि अन्याय कभी अकेला नहीं पनपता, उसे फलने-फूलने के लिए समाज के मौन समर्थन की आवश्यकता होती है। जब लोग किसी दूसरे के साथ हुए अन्याय को यह कहकर नजरअंदाज कर देते हैं कि “यह मेरा मामला नहीं है,” तब असल में वे उस अपराध को और बढ़ावा दे रहे होते हैं।
पूजा सेठ, दिल्ली के मुख्य बिंदु:
मौन की दोहरी भूमिका: एक मौन वह है जो विवेक से उत्पन्न होता है, लेकिन दूसरा मौन भय और स्वार्थ का होता है, जो धीरे-धीरे अन्याय की सहमति बन जाता है।
धर्म की वास्तविक परीक्षा: पूजा सेठ ने कहा कि केवल मंदिर में दीप जलाना या पूजा-पाठ करना ही धर्म नहीं है। असली धर्म तब जीवित होता है जब मनुष्य भय या सुविधा के बजाय सत्य और किसी निर्बल के पक्ष में खड़ा होता है। “इतिहास खामोशी को निर्दोष नहीं मानता, वह चुप रहने का गुनाह लिख जाता है।” यदि आज किसी और का सच कुचला जा रहा है और हम चुप हैं, तो कल यह दायरा हमारे दरवाजे तक भी पहुंचेगा। अकेले खड़े होने का साहस बदलाव के लिए हमेशा बड़ी भीड़ या बड़े आंदोलन की जरूरत नहीं होती। कभी-कभी किसी पीड़ित का हाथ थाम लेना और गलत के सामने ‘गलत’ कह देना ही पर्याप्त बदलाव ला सकता है। पूजा सेठ, दिल्ली ने इस बात पर जोर दिया कि अंततः जीवन में यह मायने नहीं रखता कि हम कितने धार्मिक दिखते हैं, बल्कि यह मायने रखता है कि जब किसी कमजोर की आवाज दबाई जा रही थी, तब हमारे भीतर का मनुष्य जागा था या नहीं। धर्म की असली पहचान पूजा के समय नहीं, बल्कि अन्याय के सामने डटकर खड़े होने से होती है।