ज्ञान बांटने से बढ़ता है, संजोने से घटता है : प्रदीप कुमार कुशवाहा
कवि वृन्द के दोहे में ज्ञान की महत्ता और उसके प्रसार का संदेश
लखनऊ। कवि वृन्द का प्रसिद्ध दोहा “सरसुती के भंडार की, बड़ी अपूरब बात। ज्यों खरचै त्यों-त्यों बढ़ै, बिन खरचै घटि जात॥” ज्ञान की अद्भुत प्रकृति और उसकी उपयोगिता को सहज शब्दों में व्यक्त करता है। दार्शनिक एवं चिंतक प्रदीप कुमार कुशवाहा ने दोहे की व्याख्या करते हुए कहा कि संसार के भौतिक धन के विपरीत ज्ञान ऐसा धन है, जिसे दूसरों के साथ साझा करने से वह कम नहीं होता, बल्कि निरंतर बढ़ता और निखरता है।
उन्होंने कहा कि ज्ञान को केवल अपने तक सीमित रखने के बजाय समाज के अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाना प्रत्येक शिक्षित एवं जागरूक व्यक्ति का दायित्व है। शिक्षा और अनुभव को साझा करने से समाज में बौद्धिक संपन्नता आती है तथा नई पीढ़ी को आगे बढ़ने का अवसर मिलता है।
प्रदीप कुमार कुशवाहा के अनुसार ज्ञान का उपयोग और निरंतर अभ्यास आवश्यक है। विद्या को जितना सीखा, सिखाया और व्यवहार में उतारा जाता है, उसकी उपयोगिता उतनी ही बढ़ती जाती है। इसके विपरीत ज्ञान का प्रयोग न करने पर वह धीरे-धीरे विस्मृत हो सकता है।
उन्होंने कहा कि आज के समय में ज्ञान के प्रसार के लिए शिक्षा, संवाद और आधुनिक संचार माध्यमों का सकारात्मक उपयोग किया जाना चाहिए। ज्ञान का एकाधिकार समाज के विकास को सीमित करता है, जबकि साझा ज्ञान व्यक्ति, समाज और राष्ट्र की प्रगति का मार्ग प्रशस्त करता है।
उन्होंने कहा कि कवि वृन्द का यह दोहा वर्तमान समय में भी उतना ही प्रासंगिक है। इसका संदेश है कि ज्ञान को बांटने से उसकी शक्ति और प्रभाव बढ़ता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को निरंतर सीखने के साथ अपने ज्ञान और अनुभव को दूसरों के साथ साझा करने का प्रयास करना चाहिए।