गुज़ारिश है..
बार बार हमें तोड़ कर
फिर जोड़ने की बात…
कितना लेंगे इम्तेहान ?
और क्या देंगे सौगात…?
यह क्या हो रहा है…?
आजकल हमारे साथ…।
यह कैसी नवाज़िश है?
या यों कहें तो गहरी साज़िश है,
अब रुक भी जाइए न…
गुज़ारिश है, गुज़ारिश है।
हम मंज़िल की ओर
एक कदम जहाँ बढ़ाते हैं,
फिर आपके दिए घात से
सम्भल भी न पाते हैं।
यह कैसा इम्तेहान..
कैसी ज़ुल्म-ए-आरिश है,
अब रुक भी जाइए न…
गुज़ारिश है, गुज़ारिश है।
कड़ी मेहनत से हम अपना,
एक आशियाँ बनाते हैं,
कौड़ी-कौड़ी जोड़ने के लिए,
माँ-बाप पसीना बहाते हैं।
उनके सब्र की यह
कैसी आज़माइश है…?
अब रुक भी जाइए न…
गुज़ारिश है, गुज़ारिश है।
डॉ अणिमा श्रीवास्तव
पटना, बिहार
मौलिक रचना