बुज़दिल कभी भारत का जंग जू नहीं होता, साहिल प्रतापगढ़ी,

बुज़दिल कभी भारत का जंग जू नहीं होता, साहिल प्रतापगढ़ी,,,,,,,

अनुराग लक्ष्य, 26 मई

सलीम बस्तवी अज़ीज़ी

मुम्बई संवाददाता।

ग़ज़लों ने हमेशा दिलों को जोड़ने के साथ सरहदों के पार भी जाकर अपनी मुहब्बत की शमां रोशन की है।

वोह किसी भी ज़बान में हों, भाषा कभी प्यार की सीमाएं तय नहीं कर सकती यह ग़ज़लों ने हमेशा साबित किया है। आज उसी सच्चाई को चरितार्थ करती हुई साहिल प्रतापगढ़ी की यह ग़ज़ल हमसे कुछ कहना चाहती है वो।

*१* – दिल भी मेरा ऐसे बेकाबू नहीं होता,

इश्क़ का तेरा ये जो जादू नहीं होता ।

*२* – कौन करेगा रफू अब चाके जिगर को,

इस दिल का तार बारहा रफू नहीं होता,

*३* – होता जो अमीरी का ताज मेरे भी सिर पे,

तो बज़्म में तेरी बेआबरू नहीं होता ।

*४* – हालात और फ़िक्र ने ही उसको जगाया,

हर जागने वाला कोई उल्लू नहीं होता ।

*५* – ज़ाहिद का तो है तकवा तहारत कमाल का,

जो वक्ते जाॅंकनी भी बेवज़ू नहीं होता ।

*६* – हरगिज़ न क़दम खींचेगा वो जंग में पीछे,

बुज़दिल कभी भारत का जंग जू नहीं होता ।

*७* – नब्ज़ तेज इस तरह होती नहीं *साहिल*,

उसका रुखे ज़ेबा जो रूबरू नहीं होता ।

पेशकश, सलीम बस्तवी अज़ीज़ी ।