स्तम्भवृत्ति प्राणायाम से मन और प्राण पर नियंत्रण का अभ्यास
अष्टांग योग के चतुर्थ स्तंभ प्राणायाम का महत्वपूर्ण विभाग
बस्ती। अष्टांग योग के चतुर्थ स्तंभ प्राणायाम के अंतर्गत आने वाले तृतीय विभाग स्तम्भवृत्ति प्राणायाम के अभ्यास और उसके लाभों पर योगाचार्य डॉ नवीन सिंह ने विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि यह प्राणायाम श्वास-प्रश्वास की गति को स्थिर कर मन और प्राण पर नियंत्रण स्थापित करने की प्रभावी विधि है।
डॉ सिंह ने बताया कि इस प्राणायाम के अभ्यास हेतु साधक सुखासन, सिद्धासन अथवा पद्मासन में बैठकर मन को दोनों नासिकाओं के मध्य केंद्रित करता है। निरंतर चलने वाले श्वास-प्रश्वास की अनुभूति करते हुए साधक यह अनुभव करता है कि श्वास द्वारा प्राण भीतर जा रहा है और प्रश्वास द्वारा बाहर निकल रहा है। भीतर जाता हुआ प्राण अपेक्षाकृत ठंडा तथा बाहर निकलता हुआ प्राण अपेक्षाकृत गर्म प्रतीत होता है।
जब श्वास-प्रश्वास की गति का स्पष्ट अनुभव हो जाए, तब साधक भीतर के प्राण को भीतर ही और बाहर के प्राण को बाहर ही रोकने का अभ्यास करता है। यथासामर्थ्य रोककर पुनः सामान्य श्वसन किया जाता है और इस प्रक्रिया को कम से कम तीन बार दोहराया जाता है।
सावधानियाँ
योगाचार्य ने अभ्यास के दौरान सावधानियों पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि बाह्य प्राणायाम की भांति इस अभ्यास में भी मन में जप चलता रहना चाहिए और स्वयं को शांत अनुभव करना चाहिए। किसी भी स्थिति में जबरदस्ती नहीं करनी चाहिए। यह प्राणायाम किसी भी ऋतु में किया जा सकता है। साथ ही, मार्ग में आते-जाते समय दुर्गंध अथवा अशुद्ध वायु की स्थिति में भी इस प्राणायाम के माध्यम से स्वयं को सुरक्षित रखा जा सकता है।
डॉ नवीन सिंह ने बताया कि स्तम्भवृत्ति प्राणायाम नियमित अभ्यास से मानसिक शांति, एकाग्रता तथा प्राणशक्ति के संतुलन में सहायक सिद्ध होता है।
डॉ नवीन सिंह वर्तमान में योगाचार्य के रूप में की यूनिट बस्ती से जुड़े हुए हैं।