विद्यार्थी और प्रताप
कार्तिक,देवोत्थान,सुभण
संवत सत्तर का।
शुभ मुहूर्त,शुभ घड़ी,समय
शुभ,श्री शंकर का।।
चमका पुण्य प्रताप प्रतापी
श्री गणेश का।
जनता का प्रिय भक्त,मूर्त
बलिदान देश का।।
मुंशी राम शर्मा की ये पंक्तियां उस प्रताप की गौरव की गाथा है जिसकी बुनियाद गणेश शंकर विद्यार्थी ने महज तेईस वर्ष की आयु में अपने तीन साथियों नारायण प्रसाद अरोड़ा, शिवनारायण मिश्र और यशोदानंदन के साथ मिलकर सन 1913 ईस्वी में कानपुर में एक साप्ताहिक अखबार के रूप में रखी थी। इस साप्ताहिक अखबार को निकालने से पूर्व विद्यार्थी जी सरस्वती तथा कर्मयोगी आदि पत्रिकाओं में लेखन का कार्य भी कर रहे थे। ऐसे में लेखन, संपादन तथा अध्ययन के प्रति उनकी इच्छा इतनी बलवती होती गई कि उन्होंने अपना तन मन धन सब कुछ न्योछावर करके इसका संपादन किया। जन सेवा के प्रति असीम कर्तव्यपारायणता का पालन विद्यार्थी जी ने बड़ी से बड़ी कीमत चुकाकर आजीवन करते रहे। अपनी इसी लोक निष्ठा की भावना के कारण उन्हें न जाने कितनी बार जेल जाना पड़ा। न जाने कितने जमीदारों राजाओं व महाराजाओं से नाराजगी का सामना करना पड़ा। पर उन्होंने पत्रकारिता के उदात्त मूल्यों से कभी समझौता नहीं किया। पत्रकार के लिए एक विद्यार्थी की भांति जिस प्रकार से अनेक विषयों के ज्ञान प्राप्त की जिज्ञासा होती है उसे उन्होंने सदैव बरकरार रखा। संपादक तथा पत्रकार के बजाय गणेश शंकर ने विद्यार्थी की हैसियत में ही प्रताप को शैशवकाल से कब प्रौढ़ावस्था तक पहुंचा दिया इसका पता ही नहीं चला।
कोई भी अखबार अपनी निर्भीकता,अभिव्यक्ति की क्षमता तथा स्पष्ट जन पक्षधरता जैसी नीतियों पर चलने से ही आंखों का काजल बनता है। जब इस अखबार का प्रकाशन हुआ तो उस समय यह पत्र गांधीवादी विचारधारा और क्रांति धारा को साथ में लेकर चल रहा था। बहुत ही मामूली पूंजी से इस अखबार की शुरुआत थी।
अतः ऐसे में विद्यार्थी जी स्वयं संपादकीय लिखने से लेकर प्रूफ रीडिंग तथा डाक में डालने जैसे कार्य स्वयं करते थे। विभिन्न प्रकार के संकटों का सामना करने के बावजूद भी इन्होंने अपने अखबार की नियति से कभी समझौता नहीं किया। पत्रकार के दायित्व नामक लेख में उन्होंने लिखा था कि संसार के अधिकांश समाचार पत्र पैसे कमाने और झूठ को सच और सच को झूठ सिद्ध करने में उतने ही लगे हुए हैं जितने की संसार के बहुत से चरित्र शून्य व्यक्ति। अधिकांश बड़े अखबार धनी मानी लोगों द्वारा संचालित होते हैं। इसी प्रकार के संचालन के लिए वे हर समय,हर तरह के हथकंडों से काम लेना नित्य आवश्यक काम समझते हैं। इस काम में वे इस बात का विचार करना आवश्यक नहीं समझते कि सत्य क्या है? सत्य उनके लिए ग्रहण करने की वस्तु नहीं है,वे तो अपने मतलब की बात चाहते हैं। जिन लोगों ने पत्रकारिता को अपना पेशा बना रखा है उनमें ऐसे बहुत कम लोग हैं जो अपने चित्त को इस बात पर विचार करने का कष्ट उठाने का अवसर देते हो कि हमें सच्चाई की भी लाज रखनी चाहिए,केवल मक्खन-रोटी के लिए दिनभर में कई रंग बदलना ठीक नहीं है। पत्रकारिता में धन का बोलबाला तथा पत्रकारों में व्यक्तित्व के गिरावट से वे काफी परेशान रहते थे। उनका मानना था कि यदि अर्थ कि अहमियत पत्रकारिता में बढ़ती रही तो एक दिन ऐसा आयेगा जब समाचार पत्र भी मशीन सदृश्य हो जायेंगे और उनमें काम करने वाले पत्रकार केवल मशीन के पुर्जे। व्यक्तित्व न रहेगा,सत्य और असत्य का अंतर न रहेगा, अन्याय के विरुद्ध डर जाने और न्याय के लिए आफतों के बुलाने की चाह न रहेगी, रह जायेगी केवल खींची हुई लकीर पर चलना। मैं तो इस अवस्था को अच्छा नहीं कह सकता हूं।
पत्रकारिता के कुशल संपादन के लिए पत्रकारों को विवेकवान तथा अध्ययनशील होना नितांत लाजिमी है। इसी के बल पर वह अपने पत्र को समाज में स्थापित कर सकता है। उनका मानना था कि पत्रकार की अपने समाज के प्रति बड़ी जिम्मेदारी है। वह अपने विवेकानुसार पाठकों को ठीक दिशा में ले जाता है। वह जो कुछ लिखे,प्रमाण और परिणाम पर विचार रखकर लिखे और अपनी मति-गति में सदैव शुद्ध और विवेकशील रहें। पैसा कमाना उसका ध्येय नहीं, लोक सेवा ही उसका ध्येय है और अपने काम से जो कमाता है वह ध्येय तक पहुंचने के लिए एक साधन मात्र है। आजकल के समाचार पत्रों के आकार प्रकार में उन्नत तो हुई है पर उनके आचरण में नहीं हुई है। मैं हृदय से चाहता हूं की उन्नत उधर हो या न हो किंतु कम से कम वे आचरण के क्षेत्र में पीछे न हटें और जो भी सज्जन इन पंक्तियों को पढ़े वे आचरण संबंधी आदर्श को सदा ऊंचे रखें और समझें।
प्रताप को यह जो ऊंचाई हासिल हुई थी उसमें विद्यार्थी जी के त्याग वृत्ति और सिद्धांतन्तप्रियता का बहुत योगदान रहा है। उन्होंने अपने सिद्धांत से कभी समझौता नहीं किया। आजकल के पत्रकार जहां छोटे-छोटे प्रलोभन मात्र से ही डिग जाते हैं वहीं विद्यार्थी जी का प्रिय अखबार जब विभिन्न प्रकार के आघातों का सामना करते हुए बंद हो गया तो जमनालाल बाजार ने पत्र को नियमित रूप से निकालने के लिए आर्थिक सहायता की पेशकश की पर विद्यार्थी जी ने सहायता लेने से साफ इनकार कर दिया। उनका मानना था कि यद्यपि जमनालाल बजाज मेरा आदर करते हैं तथापि महात्मा गांधी में उनकी श्रद्धा अधिक है। इसलिए सहज ही हो वे यह आशा करेंगे कि प्रताप में महात्मा गांधी के कार्यक्रम की आलोचना न की जाए। महात्मा जी के कार्यक्रम की आलोचना होने पर वे चाहे कुछ भी न कहें तब भी मन में तो यह अनुभव अवश्य करेंगे कि यह तो ठीक नहीं हो रहा है। पत्रकारिता के जिन आदर्शो को लेकर विद्यार्थी चल रहे थे वह काफी कंटकाकीर्ण था । पर वे इस कार्य को चुनौती के रूप में स्वीकार करते हुए सन 1923 ईस्वी में फतेहपुर के एक राजनैतिक सम्मेलन में कहा था कि मैं संग्राम का पक्षपाती हूं। मैं समस्त सात्ताओ का विरोधी हूं। फिर चाहे वह सत्ता मौजूदा नौकरशाही की हो या जमीदारी की, धनवानों की हो या ऊंची जातियों की। विद्यार्थी जी ने सिर्फ प्रताप के माध्यम से ही पत्रकारिता नहीं किया बल्कि जहां कहीं भी गलत देखते थे तुरंत विरोध में सक्रिय हो जाते थे। एक बार एक बेड़िया (अछूत) के पीछे पुलिस के लोगों बुरी तरह से पड़े हुए थे। ऐसे विद्यार्थी जी ने लिखा-पढ़ी करके उसे प्रताप के कार्यालय पर बुला लिया। प्रेस के कर्मचारी उस अछूत का पानी पीने में हिचकिचाते थे तब विद्यार्थी जी उससे जानबूझकर पानी मांगते और पीते। छुआछूत के इस कुप्रथा के साथ वे सांप्रदायिकता के भी खिलाफ रहते थे। जब 1931 ईस्वी में कानपुर में हिंदू-मुस्लिम दंगा हुआ तो उसकी भर्त्सना करते हुए विद्यार्थी जी ने लिखा था कि रक्तपात और नरहत्या अच्छे काम नहीं है। संसार के सुंदर और सबल आदमियों का एक दूसरे का गला काटना कोई मनोहर दृश्य नहीं है। वह आत्मा को कोई मृदु संदेश देने वाली चीज नहीं है। वही लड़ाई लाख बार शुभ और अत्यंत शुभ है जो ऊंचे भावों को कार्य में परिणित करने के लिए लड़ी जाए। जिसके पश्चात मनुष्य में मनुष्य को समझने की बुद्धि बढ़ सके और अपने स्वार्थ पर अपने से कमजोरों को बलि दे देने की प्रवृत्ति कम हो सके। ऐसे विद्यार्थी जी विचारों से जितने समाजवादी व क्रांतिकारी थे उनकी लेखनी भी इस क्रांति की ज्वाला को प्रज्वलित करने में कभी भी पीछे नहीं रही।
एक पत्रकार के लिए जिस सादगी तथा अध्ययन वृत्ति की जरुरत होती है वह विद्यार्थी जी पूर्ण रूप से विद्यमान थी। वे अधिकांश पैदल ही दफ्तर जाया करते थे। उनका दफ्तर भी साधारण ही था। यदि उसमें कोई अधिक व्यय वाला मद था तो वह थी उनकी लाइब्रेरी। में पुस्तकों के लोभी थे, विशेष रूप से समस्त देशों के स्वाधीनता संघर्ष के इतिहास से उनका गहरा लगाव था। विक्टर ह्यूगो उनके प्रिय लेखको में थे। उन्होंने प्रताप प्रेस से उनकी रचनाओं का अनुवाद व प्रकाशन भी किया। वे अक्सर कहा करते थे कि भारतीय संघर्ष के लिए संकल्पवान कार्यकर्ता उत्पन्न करने के लिए विश्व इतिहास और राष्ट्रीय समस्याओं का अध्ययन करना आवश्यक है। प्रताप का यह कार्यालय पत्रकारिता के साथ-साथ क्रांतिकारियों का भी अड्डा था। ये अपने कार्यालय में क्रांतिकारियों को भरपूर सहयोग व संरक्षण प्रदान करते थे। वे अपने सामर्थ्य के अनुसार बंदी क्रांतिकारियों को न्याय दिलाने की चेष्टा तथा उनके परिवार को सहायता प्रदान करने में कोई कोताही नहीं करते थे। काकोरी कांड की फांसियों के बाद वे राम प्रसाद विस्मिल के माता-पिता, अशफाक उल्ला खा के भाई और शहीद रोशन सिंह की पत्नी व बच्चों की मदद करते रहे। देश के प्रति प्रेम तथा एक संवेदनशील पत्रकार होने के नाते विद्यार्थी जी की आंतरिक आत्मा उन्हें ऐसा करने के लिए प्रेरित करती रहती थी।
पत्रकारिता जगत में आजकल जिस झूठे-मुठे विज्ञापनों तथा अश्लीलता का बोलबाला है विद्यार्थी जी उसके सख्त खिलाफ थे। वे प्रताप में विज्ञापनों का प्रकाशन बहुत सोच समझ कर किया करते थे। वे जिस विज्ञापन दाता के संबंध में शिकायत सुनते उसकी सच्चाई की जांच करते और विज्ञापनदाता छद्म साबित होता तो बिना समय गंवायें उसको छापना बंद कर देते थे। चाहे उन्हें कितनी भी हानि क्यों न उठानी पड़ी? अश्लीलता भरे विज्ञापन के लिए प्रताप में कोई जगह नहीं थी । विद्यार्थी जी जब भी कलम चलाते थे उनकी निगाह आम पाठको पर टिकी रहती थी। इस संदर्भ में देवव्रत शास्त्री लिखते हैं कि वे इस बात का बहुत ख्याल रखते थे कि प्रताप में कोई ऐसी चीज न प्रकाशित हो जिसे पाठक अच्छी तरह समझ ही न और उनकी रुचि बिगड़ती हो। एक दफे एक सहकारी मित्र ने एक कविता प्रकाशनार्थ देनी चाही उन्होंने उस कविता का अर्थ उसे महाशय से पूछा। वह कुछ संतोषजनक अर्थ बता न सके। उन्होंने उसे निकालकर उसकी जगह दूसरी कविता देने को कहा । यह सही है कि वे क्लिष्टिता के आधार पर लोगों की रचनाओं को अस्वीकार कर देते थे पर बहुत से लोगों को लेखक व पत्रकार बनाने में उन्होंने भरपूर सहयोग दिया। मुंशी प्रेमचंद तथा श्याम लाल गुप्ता पार्षद ने उन्हीं की प्रेरणा से झंडा गीत लिखा। भगत सिंह काफी दिनों तक प्रताप प्रेस में काम करते रहे तथा छद्म नामों से नियमित लिखते रहे।
ऐसे में कह सकते हैं कि प्रताप उनके लिए अखबारनवीसी नहीं बल्कि राष्ट्रीय नवजागरण का अभियान था। उनकी कलम की यह ताकत थी कि सोलह प्रृष्ठों के इस साप्ताहिक अखबार की पृष्ठ संख्या बढ़कर चालीस पहुंच गई। इस अखबार की लोकप्रियता तथा महत्व इतनी थी कि सुदूर अंचलों के लोग इसको पढ़ने के लिए डाकखाने पर श्रद्धालुओं की तरह एकत्रित होते थे। सुरेन्द्र नाथ शर्मा ने सच ही लिखा है-
मातृभूमि स्वाधीन बनेगी,हम होंगें स्वच्छ सभी।
अमर रहे तेरा प्रताप, यह युद्ध न होगा बंद कभी।।
नीरज कुमार वर्मा नीरप्रिय
किसान सर्वोदय इंटर कालेज रायठ बस्ती (उ.प्र.)
मो-8400088017