यह मेरा मित्र बहुत साहसी – डॉ. दिलीप चौबे

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी हाल की रूस यात्रा में एक अनोखी टिप्पणी की जिसकी ओर मीडिया ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। रूस मं वैज्ञानिक केंद्र के भ्रमण के दौरान उन्होंने राष्ट्रपति ब्लादीमिर पुतिन का कंधा थपथपाते हुए कहा, ‘यह मेरा मित्र बहुत साहसी है।Ó इस टिप्पणी का संदर्भ पुतिन के पूर्व में किए गए साहसिक कार्यों से भी हो सकता है, लेकिन इसे यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में भी देखा जा सकता है। पुतिन ने यूक्रेन में सैनिक संगठन नाटो और अमेरिका की खुली चुनौती दी है। मोदी के ‘साहसी मित्रÓ को अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन युद्ध अपराधी करार देते हैं।
इन हालात में यह स्वाभाविक है कि मोदी की सपल यात्रा को लेकर पश्चिमी देशों की भृकुटी तनी हुई है। अमेरिका के व्हाइट हाउस, विदेश मंत्रालय और पेंटागन ने सधी हुई प्रतिक्रिया व्यक्त की है। लेकिन नई दिल्ली में अमेरिकी राजदूत एरिक गार्सेटी ने अपनी नाराजगी जाहिर की है। उन्होंने कहा कि भारत और अमेरिका के संबंध हाल के वर्षो में व्यापक बने हैं, लेकिन इनकी बुनियाद ज्यादा पुख्ता नहीं है। साथ ही, उन्होंने भारत की स्वतंत्र विदेश नीति और रणनीतिक स्वायत्तता पर भी सवाल खड़ा किया। उनकी टिप्पणियों में भारत के लिए चेतावनी का तेवर था।
यह एक संयोग है कि जिस समय मोदी की रूस यात्रा हुई उसी समय वाशिंगटन में सैन्य संगठन नाटो की शिखर वार्ता आयोजित खी। इसमें सदस्य देशों तथा जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे अमेरिकी सहयोगियों ने रूस विरोधी रणनीति को अंतिम रूप दिया। यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की न अपनी भड़ास निकालते हुए कहा, ‘दुर्भाग्यपूर्ण है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश का नेता सबसे बड़े अपराधी के साथ गले मिल रहा है।Ó
मोदी की रूस यात्रा का मीडिया कवरेज पूरी दुनिया में बड़े स्तर पर हुआ जो असाधारण है। पश्चिमी देशों के मीडिया ने एक स्वर से मोदी की यात्रा की आलोचना की तथा कहा कि भारत पर भरोसा नहीं किया जा सकता। यूक्रेन के टेलीविजन ने तो भारत को रूस, ईरान, चीन और उत्तर कोरिया के शैतानी गठबंधन का सदस्य करार दिया। पश्चिमी देशों के विश्लेषक ऐसी भाषा का प्रयोग नहीं कर रहे हैं लेकिन वे भी इस यात्रा से क्षुब्ध हैं। पहले से भारत विरोधी रवैया अपनाने वाले गुटों को तो मोदी के खिलाफ विषवमन करने का एक मौका मिल गया है।
यह देखने वाली बात होगी कि पश्चिमी देशों की सरकारें आने वाले दिनों में भारत के साथ संबंधों पर क्या रवैया अपनाती हैं। इतना निश्चित है कि इन देशों में मोदी को अब पहले जैसा आदर, सत्कार और महत्त्व शायद ही मिले। अमेरिका और पश्चिमी देशों की खुफिया एजेंसियां आने वाले दिनों में मोदी सरकार के प्रति कैसा रवैया अपनातीहैं, इस पर भी भारतीय एजेंसियों को नजर रखनी होगी। पाकिस्तान में इमरान खान के साथ जैसा हुआ उसे दोहराने की कोशिश हो सकती है लेकिन भारत और पाकिस्तान तथा नरेन्द्र मोदी और इमरान खान में जमीन आसमान का अंतर है।
अमेरिका या किसी देश के लिए यह संभव नहीं है कि वह भारत को अस्थिर कर सके। यह जरूर है कि मोदी सरकार को कम बहुमत मिला है तथा देश में भी बहुत से अनसुलझे मुद्दे मौजूद हैं जिन्हें हवा दी जा सकती है। अमेरिका और पश्चिमी देशों ने एनजीओ, थिंक टैंक्स और अन्य संस्थानों के जरिए पूरे देश में जाल फैला रखा है। इन्हें किसी निश्चित उद्देश्य के लिए सक्रिय किया जा सकता है। दुनिया के कई देशों में ऐसे उदाहरण हैं जब अमेरिका ने प्रतिकूल सरकारों को गिराने या अस्थिर बनाने की साजिश की है। भारत में शायद ही ऐसा हो लेकिन अपनी ओर से सतर्कता जरूरी है।
इस यात्रा की उपलब्धियों के बारे में दोनों देशों ने सार्वजनिक रूप से ज्यादा ब्यौरा नहीं दिया है, लेकिन यह निश्चित है कि सैनिक और आर्थिक मोच्रे पर जो सहमति बनी हैं, वे भविष्य में साकार होंगी। द्विपक्षीय व्यापार को वर्ष 2030 तक बढ़ाकर 100 अरब डॉलर करने का लक्ष्य रखा गया है तथा डॉलर से इतर भुगतान प्रणाली पर सहमति बनी है। सैन्य उत्पादन के जरिए भारत के मेक इन इंडिया अभियान को मदद मिलेगी।

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