यक्ष प्रश्न के समाधान- आचार्य सुरेश जोशी

🌼🌼 ओ३म् 🌼🌼 🌲 यक्ष प्रश्न कर्मकांड के 🌲 गोरखपुर मंडल के सुप्रसिद्ध स्वाध्याय शील,जिज्ञासु व साधक आदरणीय राम यतन यादव जी ने 🌴 वर्तमान में प्रचलित कर्मकांड के 🌲 ऊहापोह 🌲 पर कुछ यक्ष प्रश्न किए हैं।उनका समाधान स्वमति के अनुसार व कतिपय आप्त प्रमाणों के साथ करने का पुरुषार्थ किया गया है। 🍁🍁 यक्ष प्रश्न [१] 🍁🍁 आचार्य सुरेश वैदिक प्रवक्ता जी, आदरणीय आचार्य! ऐसी स्थिति में जबकि कोई सामूहिक आयोजन हो और अग्निहोत्र करने वाले अनेक हों यथा- * उद्घाटन समारोह आदि * वार्षिक उत्सव आदि में जैसा कि एक ही यज्ञ कुंड होने और यज्ञ करने वाले यजमान अनेक होने पर प्रायः कुछ (३ या ५)आहुतियां दिलाकर स्थान परिवर्तन कर लिया जाता है! तो कुछ लोग स्थान परिवर्तन में (उठने बैठने से) व्यवस्था भंग का दोष लगाते हैं और एतद्हेतु एक से अधिक कुंड की अनुशंसा करते हैं! 🌿 प्रश्न संख्या एक के संदर्भ में 🌿 वैदिक संस्कृति में महाभारत काल तक कोई वार्षिक उत्सव या उद्घाटन नहीं होते थे।उस समय समस्त भू-लोक में केवल🌸 पंच-महायज्ञ और १६ संस्कार 🌸 ही समस्त कर्मकांड था। इसलिए न मत-मतांतर थे।न पाखंड था। इन पंचमहायज्ञों और १६ संस्कारों के अतिरिक्त समय था ही नहीं कि वार्षिकोत्सव किए जाएं। क्योंकि सभी राजा व प्रजा दोनों धर्म निष्ठ थी। इसके अतिरिक्त जो अश्वमेध या राजसूय यज्ञ होते थे उनके भी सुविज्ञ जन व उसकी आचार संहिता थी उसमें भी ये समस्याएं नहीं थी। अब आप समझ गए होंगे कि आपका जो प्रश्न संख्या एक है वह उस देश काल परिस्थिति का है जब धर्म समाप्त हो गया और उसे पुनर्जीवित करने के लिए महापुरुषों का आगमन हुआ।अब यहां भी यही देखना उचित है कि अधिक से अधिक शास्त्रों की मर्यादा को ही स्थापित किया जाए, जिससे कर्मकांड पाखंड का रुप न ले। इसके नियम इस प्रकार हैं। [१] दर्शक भले ही कितने हों जो सर्वप्रथम बैठे हों उन्हीं से यज्ञ सम्पन्न किया जाए।शेष श्रोताओं को इसी तरह स्वयं यजमान बनने की प्रेरणा की जाए। इससे हर मानव को इस यज्ञ विद्या को स्वयं जानने की प्रेरणा होगी। जब आप सबको बैठाकर हवन कराओ देते हैं तब उनमें से अधिक लोगों को आहुति देने का भी ज्ञान नहीं होता।क ई लोग बिना स्वाहा बोले आहुति देते हैं।क ई सज्जन मेखलाओं में ही सामग्री डालकर चले जाते हैं। क ई लोग सोचते हैं हमने आहुति तो दे ही ली है अब हमें अलग से यज्ञ करने की क्या आवश्यकता है ? क ई लोग बिना स्नान किए।बिना तुले वस्त्रों के और क ई लोग अभक्ष्य पदार्थ खाकर भी आहुति दे जाते हैं क्योंकि वो जानते हैं कि यहां सबको छूट है यज्ञ करने की चलो हम भी डाल देते हैं। इस व्यवस्था में दो दोष आते हैं। (१) इसका पाप उस आचार्य को भी भोगना पड़ता है जो ऐसी व्यवस्था को दे रहा है। (२) अग्निहोत्र कर्म की पवित्रता। शांति। वैज्ञानिकता व आचार संहिता नष्ट होती है जिससे बौद्धिक संपदा वाले लोग इस विधि की उपेक्षा करने लगते हैं।आप जानते हैं किसी भी उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रवेश परीक्षा होती है उसमें जो भी उत्तीर्ण हो उसे शिक्षा मिलेगी। मगर जहां अधिकार/ व अधिकारी का चयन नहीं होता है वहां सब धान बाईस पसेरी हो जाता है। अनेक यजमान अलग-अलग दिन यजमान बनेंगे तो प्रचार के दिन भी अधिक होंगे,उसका क्षेत्र भी बढ़ेगा और संख्या भी बढ़ेगी व धर्म का विस्तार भी होगा। अति-आपात काल में या अति उत्साह में आप अधिक लोगों से आहुति दिलाना आवश्यक समझते हैं तो उसकी व्यवस्था पहले से बना लेनी चाहिए। कुछ कार्यकर्ताओं को पहले से प्रशिक्षित किया जाए जिससे वो अव्यवस्था को रोकें मगर यह व्यवस्था दीर्घ काल तक चलने वाली नहीं है। अनेक कुंड आपको यदि अव्यवस्था में करने भी पढ़ें तो आप उसे बहु कुंडीय यज्ञ नहीं कह सकते और न ही उसका प्रचार कर सकते! आज जो समस्त 🍁 बहु कुंडीय 🍁 खड़ी है ये भूतकाल की गलतियों का ही परिणाम है।इसे सुधार लेना ही सज्जनता व धर्म रक्षा का उपाय है। यदि इसे न रोका गया तो भविष्य में वेद प्रवचन भी बंद हो जायेंगे और यज्ञ जादू का पिटारा बना जाएगा। अतः बहु-कुंडीय यज्ञ कर्मकांड को बचाने के लिए बंद कर देना ही विद्वानों को अभीष्ट है।इस से धन हानि होगी। संख्या कम होगी यह बहुत बड़ी भ्रांति है। आर्य विद्वानों व आर्य समाजियों को चाहिए कि 🪷 बहु कुंडीय यज्ञ की जगह पर 🌻 पंचमहायज्ञ/ व १६ संस्कारों का अभियान चलाकर घर पहुंचाया जाए। इससे अपार धन की प्राप्ति व सत्य धर्म का प्रचार भी होगा। 🍁🍁 यक्ष प्रश्न [२] 🍁🍁 २- अनेक व्यक्तियों की उपस्थिति होने पर क्या प्रत्येक से कोई निश्चित संख्या में आहुति दिलाई जाए या स्वविवेक से कुछ कम-अधिक कर लिया जाए! इसमें निर्दोष विधि क्या है? 🌿 प्रश्न संख्या दो के संदर्भ में 🌿 इसका उत्तर 🌴 स्विष्ट कृत मंत्र 🌴 स्वयं दे रहा है। व्यक्ति एक हो या दो सिद्धांत की रक्षा प्राथमिकता होनी चाहिए।जब आपके पास संस्कार विधि आप्त पुरुष महर्षि दयानंद सरस्वती जी की है उसको प्रमाण मान करना चाहिए। वहां स्वामी जी स्पष्ट लिखते हैं कि दैनिक अग्निहोत्र के बाद यदि अधिक आहुति देने की आवश्यकता हो तो केवल विश्वानि देव…. ‌‌/ गायत्री से ही दें! यहां प्रश्न यज्ञ की विधि का है। यहां पर वेदों की रक्षा कैंसे होगी ये बात तो प्रकरण के विपरीत की है या किसी🏹 मन- मौजी 🏹 विद्वान की है। हां यदि आपको वेदों की रक्षा कैसे होगी? इसकी चिंता है तो आप 📙 ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका 📙 का अध्ययन करें वहां सारी व्यवस्था है।या दैनिक यज्ञ के बाद किसी विद्वान का इस विषय पर व्याख्यान करायें। मेरा तो मानना है कि यदि आप केवल दैनिक अग्निहोत्र को ही ३६५ दिन करें और करायें तो भी वेदों की रक्षा हो जायेगी इसके लिए अधिक मंत्र पड़े जाने से वेदों की रक्षा होगी उचित तर्क नहीं है। आपको वेदों की रक्षा करनी है तो आप अपने सामर्थ्य से। ग्राम सभा के सहयोग से। प्रदेश सरकार/ केंद्र सरकार वा भामाशाहों की सहायता से 📗 वेद पारायण यानि वेदों के विद्वान बुलाकर साप्ताहिक/मासिक कार्यक्रम रखें उसमें वेद के विद्वान को बुलाकर 🧘 मंत्रों के सस्वर पाठ सीखें। पदार्थ सीखें।अर्थ सीखें व सबसे महत्वपूर्ण उसके अनुसार आचरण सीखें 🧘 इससे वेदों कि रक्षा होगी न कि 🌴अधिक मंत्र पाठ,अधिक सामग्री,अधिक आहुति 🌴 देने से! अतः स्विष्ट कृत आहुति पर यह कह देने मात्र से काम नहीं चलेगा कि हमने कुछ अधिक हवन किया या कम इसके लिए प्रायश्चित आहुति दे देंगे और पाप से बच जायेंगे। सावधान! जैसा कर्म वैसा फल। आज नहीं तो निश्चित कल।। प्रायश्चित आहुति सावधान करती है पाप क्षमा नहीं करती।पाप भोगने ही पड़ते हैं। अतः स्वामी जी को प्रमाण माने। स्वामी जी ऋषि हैं। ऋषि हमेशा सतोगुणी होते हैं और दूर -दृष्टा होते हैं। अगर उन्हें लगता कि अधिक आहुति देने से ही वेदों की रक्षा होगी तो वो लिख देते कि और अधिक मंत्रों से आहुति दीजिए। जबकि ऋषि जानते थे भविष्य में ऐसे लोग आ सकते हैं जो केवल कर्मकांड के एक पंख से ही आकाश में उड़ने की घोषणा करेंगे इसलिए उन्होंने कहा अधिक आवश्यकता हो तो केवल इन दो मंत्रों से ही कुछ अधिक दे सकते है। 🍁🍁 यक्ष प्रश्न [३] 🍁🍁 ३- स्थान परिवर्तन के क्रम में आगत क्रमिक यजमानों से मात्र गायत्री मंत्र और विश्वानिदेव …..! अर्थात् इन्हीं दो मंत्रों से आहुतियों की आवृत्ति -पुनरावृत्ति की जाए या अन्य भी मंत्रों से आहुतियां प्रदान की जाएं! (कुछ लोग अन्य मंत्रों से भी आहुतियां दिलाते हैं! निर्दोष शास्त्रसम्मत विधि क्या है? कुछ लोगों के आक्षेप हैं कि जब यज्ञ में मंत्रों की आवृत्ति -पुनरावृत्ति से वेद मंत्रों के स्मरण और रक्षा का ध्येय निहित है तो अन्य मंत्रों से आहुतियां डालना-डलाना समीचीन है, न कि केवल गायत्री और विश्वानिदेव …मंत्र से! मात्र इन दो मंत्रों की आवृत्ति- पुनरावृत्ति से कैसे वेदमंत्रों की स्मृति और रक्षा होगी ? इसमें निर्दोष विधि क्या है? इसमें तो महर्षि ने इन्हीं दो मंत्रों का उल्लेख किया है? या मैं त्रुटिपूर्ण कह रहा हूं? कृपया इसमें भी निर्दोष विधि को स्पष्ट करें! 🌿 प्रश्न संख्या ३के संदर्भ में 🌿 इसका उत्तर प्रश्न संख्या दो के उत्तर में दिया जा चुका है। 🍁🍁 यक्ष प्रश्न [४] 🍁🍁 ४- यज्ञ प्रार्थना में ‘हाथ जोड़ झुकाय मस्तक…!’ कहना अथवा इसके स्थान पर जो परिवर्तित पंक्तियां-‘प्रेम रस में तृप्त होकर…!’ कहना, कौन सा समुचित है? ‘हाथ जोड़ झुकाय मस्तक पर पौराणिकता का आक्षेप प्राप्त होता है! इस पर विचार देने की कृपा करें ! जैसा कि मुझे उपरोक्त बिंदुओं पर प्रायः मतभिन्नता देखने-सुनने में प्राप्त होती है! इसलिए मैंने अपनी ये कुछ सामान्य सी जिज्ञासाएं आपके समक्ष रखी हैं ! आप यथासमय अपनी सुविधा के अनुसार अवसर मिलने पर समुचित विचार देंगे,इसी विनम्र विनती के साथ सादर! 🌿 प्रश्न संख्या ४ के संदर्भ में 🌿 यदि आप बिना यज्ञ-कुंड पर सिर झुकाए और हाथ जोड़े केवल भावपूर्ण होकर गा रहें तो इसे भाव ही समझा जाएगा और कुछ नहीं। यदि आपने साकार यज्ञ वेदी की होरा दोनों हाथ जोड़े हैं और सिर झुकाया है तो इसका अर्थ है कि आपको साकार -निराकर का यथार्थ ज्ञान नहीं है उसके लिए अधिक से अधिक विद्या की वृद्धि करनी होगी।जो सुविज्ञ हैं वो भक्ति रस या प्रेम रस का प्रयोग करते ही हैं। हां एक बात का ध्यान रहे! अगर कोई व्यक्ति यज्ञशाला पर हाथ जोड़कर कर सिर झुकाकर यह क्रिया कर रहा है तो उसे अपमानित न करें! कटाक्ष न करें! इससे वह अपना अपमान समझ कर आपकी सभा का बहिष्कार करेगा इसका पाप आपको भी लगेगा। ऐसे व्यक्ति पर करुणा कीजिए और एकांत में उसे वैदिक सिद्धांतों की जानकारी दीजिए यही धर्मानुकूल आचरण है। 🏵️ आपका आभार 🏵️ आदरणीय राम यतन महाशय जी आपने इन🍁 यक्ष प्रश्नों 🍁 को पूछकर अनेक जिज्ञासुओं का उपकार किया है एतदर्थ आपका धन्यवाद! 🏵️🏵️ विदुषामनुचर :🏵️🏵️ आचार्य सुरेश जोशी वैदिक प्रवक्ता आर्यावर्त साधना सदन पटेल नगर दशहराबाग उत्तर प्रदेश।

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