अब वो पहले से न फ़नकार नज़र आते हैं।

ग़ज़ल

ये तबाही के ही आसार नज़र आते हैं।
प्यार के हमको जो बाज़ार नज़र आते हैं।

रास्ते कोई न हमवार नज़र आते हैं।
रास्ते सारे ही पुरख़ार नज़र आते हैं।

कोशिशें कम तो नहीं की है ढहा दें इनको।
दरमियां फिर भी तो दीवार नज़र आते हैं।

गायकी से भी दिये लोग जलाते थे कभी।
अब वो पहले से न फ़नकार नज़र आते हैं।

अब किनारे की ख़बर कोई नहीं है हमको।
हर तरफ़ हमको तो मंझधार नज़र आते हैं।

कुछ बताते भी नहीं बात हुई क्या ऐसी।
आप हर शै से ही बेज़ार नज़र आते हैं।

बात करते हैं हमेशा ही सितारों की जो।
रूप वो लोग तो मक्कार नज़र आते हैं।

रूपेंद्र नाथ सिंह रूप

क्या कहने वाह
बहुत उम्दा अशआर @Rupendranath Singh साहब बहुत उम्दा वाह वाह

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