तमाम रात जला खुद, मुझे जलाया भी।-विनोद उपाध्याय हर्षित

ग़ज़ल

क़दम क़दम पे दिया प्यार का जलाया भी।
न जाने क्यू मुझे फिर उसने आजमाया भी।।

हरेक रिश्ता ज़माने का वोनिभाया भी।
चराग़ बन के अंधेरों में जगमगाया भी।
समझ न पाया मोहब्बत की वो हक़ीक़त को ।
तमाम रात जला खुद, मुझे जलाया भी।।

तमाम उम्र भला कौन साथ देता है।
कभी था अपना यहां जो हुआ पराया भी।।

यकीन कैसे करूं उस पे ये बताएं कोई ।
बिठा के जिसने बुलंदी पे है गिराया भी।।

वो जिसने दुनिया बनाई उसीने दुनिया को।
तमाम ज़ीस्त रुलाया भी और हंसाया भी

विनोद उपाध्याय हर्षित

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