दुःख मन का धर्म है, आत्मा का नहीं – शास्त्री

बस्ती। दुर्वासा ऋषि के आशीर्वाद से माता कुन्ती को असाधारण सामर्थ्य प्राप्त हुआ कि अपने मन्त्र के प्रभाव से कुन्ती जब चाहेंगी तब प्रमुख देवताओं को बुला सकती हैं। बिना समय देवताओं को बुलाया तो कुमारावस्था में ही माता बनने का कलंक लगा। सामर्थ्य सेवा के लिए है रौब झाड़ने के लिए नहीं। यह सद्विचार कथा व्यास डॉ राम सजीवन शास्त्री जी महाराज ने हर्रैया विकासखण्ड के समौड़ी गाँव में शनिवार को श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन व्यक्त किया।
महात्मा जी ने कहा कि बिना ईश्वर के संसार अपूर्ण है। भागवत शास्त्र का आदर्श दिव्य है। गोपियों ने घर नहीं छोड़ा, वन नहीं गयीं उन्हें लता, फूल, वृक्ष में कन्हैया दिखाई पड़ते हैं। भक्ति केवल मंदिरों में नहीं जहाँ बैठ जाओ वहीं भक्ति है। दुःख मन का धर्म है, आत्मा का नहीं। सात दिनों में राजा परीक्षित नें सद्गति प्राप्त किया फिर हम सबका उद्धार क्यों नहीं होता। हमें परीक्षित जैसा श्रोता होना चाहिए और गुरु शुकदेव जी जैसा हो तो उद्धार हो जाए।
शास्त्री जी ने कहा कि भागवत मनुष्य को निर्भय बनाती है पाप करते समय मनुष्य नहीं डरता, उसे भय तब लगता है जब पापों की सजा भुगतने का समय आता है । धु्रव जी मृत्यु के सिर पर पांव रखकर गए, परीक्षित ने स्वयं कहा मुझे अब काल का भय नहीं रहा श्रीमद् भागवत धर्म के साधारणीकरण और जीवन के साथ ही मृत्यु सुधारने की कथा है।भागवत के भगवान अति सहज हैं, वे ग्वाल, बाल, गोपिकाओं सबके साथ सीधा संवाद करते हैं ।व्यास जी के मन में जब यह इच्छा हुई कि एक ऐसा ग्रंथ रचा जाए जिससे सहज मुक्ति हो तो गणेश जी ने उसे लिखने का दायित्व निभाया और युगों से भागवत धर्म की रक्षा कर लोगों के जीवन का पथ प्रदर्शन कर रही है यह प्रेम का शास्त्र है और इसके प्रचार के लिए भगवान शिव ने शुकदेव के रूप में अवतार लिया। भगवान से सात दिनों में ज्ञान और वैराग्य जागता है।
इस दौरान देवेंद्र नाथ मिश्र श्बाबू जीश्, धीरेन्द्र नाथ मिश्र, श्रीनाथ मिश्र, सुरेंद्र नाथ मिश्र, राम सुमति मिश्र, नन्द कुमार मिश्र, धरणीधर मिश्र, रामफूल मिश्र, विजय नारायण मिश्र, पानी बाबा, अनिल मिश्र, सुनील मिश्र, महेंद्र मिश्र, प्रेम शंकर ओझा, विजय मिश्र, बब्बू, रवीश, उत्तम, बजरंगी, हर्ष सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।

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