जिधर भी देखिए ग़म की लकीर काली है, किसी के घर में अंधेरा कहीं दिवाली है,सलीम बस्तवी अज़ीज़ी,,,,,,,

अनुराग लक्ष्य, 6 नवंबर
मुम्बई संवाददाता
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी ।

” आई दीवाली दिल में उमंगे लिए हुए,
खुशियों की मीठी मीठी तरंगें लिए हुए ।
चाहत की डोर थामे चलो आस्माँ में हम,
उड़ जाएं उल्फतों की पतंगें लिए हुए” ।।

समस्त देश वासियों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ दिली मुबारकबाद ।
लेकिन इस सच्चाई से भी कैसे इंकार किया जा सकता है कि, आज पूरा देश जहाँ नफ़रत की ज़द में धधक रहा है, ऐसे आलम में कैसी दिवाली कैसी खुशी । हर इंसान अपने आप में एक लड़ाई लड़ रहा है। हर एक की ज़बाँ पर बस यही कड़वाहट है कि,

” जिधर भी देखिए ग़म की लकीर काली है,
किसी के घर में अंधेरा कहीं दिवाली है।
अजीब रीत है दुनिया बनाने वाले की,
कोई यहाँ पे शहंशाह कोई सवाली है ” ।।

दुनिया बनाने वाले का शायद यही निज़ाम है कि कहीं धूप कहीं छांव, कहीं खुशी कहीं ग़म, कहीं दिन कहीं रात, कहीं अर्थी कहीं बरात।इस मुकाम पर आकर यह महसूस होता है कि क़ुदरत के इसी निज़ाम में अच्छाई भी है और बुराई भी । लेकिन जब जब बुराई हद से आगे बढ़ जाती है तब तब अच्छाई का प्रकाश बिखेरने के लिए कुदरत अपना इंतज़ाम भी कर देती है ।
इसी बुराई पर अच्छाई की विजय का पर्व है दीपावली।
जिसकी खुशी में पूरा देश प्रकाश के पर्व दीपावली को बड़े ही हर्ष और उल्लास के साथ मनाता आ रहा है और जब तक बुराई पर अच्छाई की जीत होती रहेगी तब तब यह उदघोष भी होता रहेगा कि,

” नफ़रत की दीवार गिराने आई दीवाली,
सहरा सहरा फ़ूल खिलाने आई दीवाली।
हर आँखों में सपने हों और देश बने खुशहाल,
दुश्मन को भी गले लगाने आई दीवाली ” ।।