श्रद्धा का दीया या बाज़ार का दिखावा क्या बाज़ार तय करेगा हमारी आस्था पूजा सेठ

 

महेन्द्र कुमार उपाध्याय
अयोध्या। त्योहारों के आते ही सजने वाले बाज़ार, विज्ञापनों की चकाचौंध और सोशल मीडिया के इस दौर में आज एक आम मध्यमवर्गीय परिवार भीतर ही भीतर सहम सा जाता है। “महालक्ष्मी पोटली नहीं बनाई तो बरकत नहीं होगी”, “धनतेरस पर चांदी का सिक्का नहीं खरीदा तो तिजोरी खाली रहेगी”ऐसी न जाने कितनी मनगढ़ंत बातें और टोटके एक आम इंसान के मन में अनजाना डर, हीनभावना और असुरक्षा पैदा कर रहे हैं। प्रसिद्ध लेखिका व विचारक पूजा सेठ ने दिवाली के पर्व पर गहरा विचार रखते हुए कहा है कि आस्था जब विज्ञापनों और बाज़ार के दबाव से मुक्त होकर अंतर्मन से जुड़ती है, तभी जीवन में सच्ची सुख-समृद्धि का वास होता है। ईश्वर को सांसारिक तराजू में तौलना बंद हो
पूजा सेठ ने कहा कि ठहरकर सोचने का समय है कि क्या ब्रह्मांड की रचना करने वाली, जगत जननी मां लक्ष्मी इतनी निष्ठुर हो सकती हैं कि वे किसी के घर का रास्ता सिर्फ इसलिए भूल जाएं क्योंकि वहां चांदी का सिक्का या महंगी पोटली नहीं थी? यह भ्रम हमारे समाज में तब तक चलेगा जब तक हम भक्ति को ‘व्यापार’ और श्रद्धा को ‘दिखावा’ समझते रहेंगे। बाज़ार ने आज हमारी पवित्र आस्था को एक मुनाफे वाले पैकेज में तब्दील कर दिया है। डर और लालच का यह खेल सिर्फ इसलिए फल-फूल रहा है क्योंकि इंसान अपनी आस्था में असुरक्षित महसूस करने लगा है और उसने ईश्वर को भी सांसारिक तराजू में तौलना शुरू कर दिया है। हम यह बुनियादी बात भूल गए हैं कि हमारे ऋषि-मुनियों और शास्त्रों ने हमेशा ईश्वर को भाव का भूखा बताया है, धन-दौलत का नहीं।
सादगी और संतोष की पूजा ही सबसे मुकम्मल जरा विचार कीजिए, एक मध्यमवर्गीय परिवार का वह मुखिया जो अपनी पूरी ईमानदारी की कमाई से, अपने बच्चों की मुस्कान के लिए घर में श्रद्धा से मिट्टी के चार दीये लाता है; वह मां जो पूरे घर को साफ-सुथरा करके, शुद्ध मन से केवल एक लोटा जल, कुछ बताशे और रोली-चावल लेकर पूजा की थाली सजाती है—क्या उनकी यह सरल पूजा अधूरी है? बिल्कुल नही वास्तव में, सादगी और संतोष से भरी वही पूजा ब्रह्मांड में सबसे अमीर और मुकम्मल है। मां लक्ष्मी को किसी कृत्रिम पोटली की बनावट या महंगे सिक्कों की चमक नहीं खींचती, बल्कि उन्हें उस घर का संतोष, सात्विकता और निश्छल प्रेम आकर्षित करता है। जहां पसीने और ईमानदारी की रोटी बनती है, जहां परिवार के सदस्यों के बीच आपस में सम्मान और गहरा स्नेह होता है, मां लक्ष्मी जी वहीं स्थाई रूप से वास करती हैं। वहां किसी बाहरी टोटके की जरूरत ही नहीं बचती।
बाज़ारवाद की बेड़ियों को तोड़ने का आह्वान इस दीपावली, आइए हम सब मिलकर बाज़ारवाद के इस मनोवैज्ञानिक दबाव और भ्रम की बेड़ियों को तोड़ें। अगर जेब इजाजत न दे, तो किसी भी सामाजिक दिखावे की होड़ में न आएं। अपने घर के शांत मंदिर में बैठें, आंखें मूंदें, मां को पुकारें और कहें—”मां, मेरे पास सोने-चांदी की भौतिक चमक तो नहीं है, पर मेरे मन में आपके लिए असीम श्रद्धा और समर्पण का भाव है। विश्वास मानिए, आपकी यह साधारण और आडंबरहीन पूजा बाज़ार की हर महंगी पूजा से हजार गुना अधिक सफल, सिद्ध और फलदायी होगी। क्योंकि भगवान केवल ‘भाव’ देखते हैं, ‘बाज़ार’ नहीं।