गर्दिशे वक़्त का शिकार हूँ मैं

गर्दिशे वक़्त का शिकार हूँ मैं,
उँगलियों में दबा सिगार हूँ मैं।

जिस को संगत नहीं नसीब हुई,
गर्द आलूद वो सितार हूँ मैं।

लोग कतरा के निकल जाते हैं,
जैसे टूटी हुई मज़ार हूँ मैं।

तल्ख़ लहजे में मौत ने पूछा,
भागता क्यों है तेरा प्यार हूँ मैं।

ग़ौर से रुक के लोग पढ़ते हैं,
जैसे तहरीर-ए-सोग़वार हूँ मैं।

पास मेरे जो आओ तो जानो,
ज़र्द मौसम नहीं बहार हूँ मैं।

एक दिन ज़ीस्त मुझ से बोली नदीम,
ऐसा लगता है तुझ पे बार हूँ मैं।

नदीम अब्बासी “नदीम”
गोरखपुर॥