नवरात्र विशेष बाह्य आडंबरों से परे, चेतना और आत्म-रूपांतरण के शक्ति-पर्व का संदेश — पूजा सेठ

 

महेन्द्र कुमार उपाध्याय
अयोध्या।नई दिल्ली शारदीय नवरात्र के पावन अवसर पर देशभर के पूजा पंडालों, मंदिरों और घरों में माँ दुर्गा के स्वागत की भव्य तैयारियाँ जोरों पर हैं। चारों ओर दीप जल रहे हैं और मंत्रोच्चार से वातावरण भक्तिमय बना हुआ है। परंतु इस वर्ष देवी-उपासना का मुख्य संदेश केवल बाह्य अनुष्ठानों तक सीमित न रहकर मनुष्य के भीतर छिपी चेतना और मानवीय मूल्यों के जागरण की ओर संकेत कर रहा है। सामाजिक चिंतक पूजा सेठ के अनुसार, नवरात्र का वास्तविक अर्थ अपने भीतर के अंधकार, अहंकार और विकारों का नाश करना है। आज के आधुनिक युग में मनुष्य ने तकनीक के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है, परंतु अपने ही भीतर शांति और धैर्य खो दिया है। संबंधों में ईर्ष्या, क्रोध और अहंकार बढ़ता जा रहा है। ऐसे में माँ दुर्गा का आह्वान केवल बाहरी बुराई पर विजय का उत्सव नहीं, बल्कि अपने भीतर की ‘महिषासुर’ रूपी हठ और ‘रक्तबीज’ रूपी नकारात्मक प्रतिक्रियाओं पर नियंत्रण पाने का संकल्प है। महर्षि अरविंद के ‘समग्र योग’ का संदर्भ
इस आत्म-रूपांतरण को महर्षि अरविंद के ‘समग्र योग’ और ‘अतिमानसिक चेतना’ के सिद्धांत से जोड़कर देखा जा रहा है। श्री अरविंद के दर्शन के अनुसार, आध्यात्मिक चेतना का अवतरण केवल व्यक्तिगत शांति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के मन, प्राण, बुद्धि और व्यवहार के पूर्ण रूपांतरण की आकांक्षा है। यदि यह चेतना जीवन में उतरती है। बुद्धि में सत्य अपने अहंकार के विरुद्ध भी सत्य को स्वीकार करने का साहस आता है। संबंधों में सम्मान असहमति के बावजूद दूसरे की गरिमा बनाए रखने का विवेक जागता है।
व्यवहार में करुणा: व्यक्तिगत लाभ से ऊपर उठकर सर्व-कल्याण की भावना का विस्तार होता है। उत्सव बने जीवन की नई दिशा वैश्विक स्तर पर व्याप्त तनाव और हिंसा के बीच यह संदेश स्पष्ट करता है कि विश्व शांति केवल समझौतों से नहीं, बल्कि मनुष्य की आंतरिक चेतना बदलने से आएगी। पूजा और जीवन के बीच की दूरी को समाप्त करना ही इस पर्व का मुख्य उद्देश्य होना चाहिए। जब नवरात्र के बाद प्रतिमा विसर्जन का समय आए, तो हमारी जागृति का विसर्जन न हो—यही इस शक्ति-पर्व की वास्तविक सार्थकता है।