ग़ज़ल
उसकी फ़ेहरिस्त में मुझ को नहीं जोड़ा जाता,
और मेरा साथ भी उस से नहीं छोड़ा जाता।
कुछ तो है बात यक़ीनन मेरे अफ़साने में,
वरना फिर आपसे पन्ना नहीं मोड़ा जाता।
जिस तरह छोड़ दिया आपने तन्हा मुझ को,
उस तरह से तो किसी को नहीं छोड़ा जाता।
जोड़ना था कहाँ पर और कहाँ जोड़ दिया,
दर्सगाहों को बमों से नहीं जोड़ा जाता।
घर हो अल्लाह का,गिरजा हो या मंदिर कोई,
किसी भगवान के घर को नहीं तोड़ा जाता।
बेरुख़ी उनकी मेरे दिल पे कुछ ऐसी गुजरी,
ख़ुद को अब उनकी गली में नहीं मोड़ जाता।
बस यही सोच के तन्हा हूँ नदीम आज तलक,
ऐरे ग़ैरे से तो रिश्ता नहीं जोड़ा जाता।
नदीम अब्बासी “नदीम”
गोरखपुर॥