माँग रहा है मुझसे चुल्लू भर पानी, देखो दरिया कितना प्यासा लगता है, नवनीत कुमार शुक्ला,,,,,,,,,,,

अनुराग लक्ष्य, 24 अगस्त
मुम्बई संवाददाता ।

सलीम बस्तवी अज़ीज़ी
,,, यहाँ हिन्दी के संग रखना है गर उर्दू ज़बाँ ज़िन्दा,
तो अपने घर को आओ , पंत, और ,खैयाम, कर डालें ,,,,
जी हाँ, मैं सलीम बस्तवी अज़ीज़ी, आज इस समाचार को लिखते वक्त मैंने अपने इस शे,र का हवाल इस लिए दिया है कि आज हम उत्तर प्रदेश के ज़िला महराजगंज के जिस शायर को पढ़ने जा रहे हैं वोह सच में इसके सच्चे हक़दार हैं।
दुनिया ए अदब जिन्हें मोहतरम नवनीत कुमार शुक्ला के नाम से जानती और पहचानती है।
हिंदी परिवेश में शिक्षा दीक्षा लेने के बावजूद नवनीत के दिल में जो उर्दू की मोहब्बत है, उसे देखते हुए यह कहना पड़ रहा है, कि फिराक गोरखपुरी की रवायत को कायम करने वाला शायर पूर्वांचल में जन्म ले चुका है। जो निःसंदेह एक दिन उर्दू अदब का एक सच्चा नुमाइंदा साबित होगा। आइए, आज उन्हीं की एक ग़ज़ल से आपको रूबरू कराता हूँ।

1 / सबका चेहरा उसका चेहरा लगता है,
सारा आलम उसके जैसा लगता है ।

2 / मुँह पे कह देता है सारी सच्चाई,
दोस्त नहीं लगता है शीशा लगता है ।

मांग रहा है मुझसे चुल्लू भर पानी,
देखो दरिया कितना प्यासा लगता है ।

4/ मुझसे बोलो या फिर चाहे मत बोलो,
साथ में रहना लेकिन अच्छा लगता है ।

तुमको देखा जी भर मैंने तब जाना ,
अच्छी चीजों का भी चस्का लगता है ।

पेशकश,,,,,, सलीम बस्तवी अज़ीज़ी,,,,