यमराज मित्र के दोहे
डूबे सब निज स्वार्थ में, झूठी तेरी आस।
अब तो लगते हैं सभी, सड़ी हुई सी घास।।
सावधान रहिए सभी, और संग में ध्यान।
डूबे सब निज स्वार्थ में, झूठा है सम्मान।।
चाहे दे दो प्राण भी, इनकी खातिर खास।
डूबे सब निज स्वार्थ में, देंगे केवल त्रास।।
बादल छाए संदेह के, अब रिश्तों के बीच।
घटनाएं जो घट रहीं, हंसती इसको सींच।।
अब मानव संदेह से, कैसे होगा दूर।
नहीं पता चलता उसे, किस पल वो मजबूर।।
सत्य सनातन धर्म पर, जो करते संदेह।
कैसे हम इनसे करें, अपनेपन का नेह।।
समय-समय की बात है, समय मित्र यमराज।
अगर समय दे कष्ट तो, करिए उल्टे काज।।
दीवाना होना नहीं, बिना किसी आधार।
वरना होगे एक दिन, बिना नाव पतवार।।
वीराना सा लग रहा, अब तो घर परिवार।
मोबाइल के दौर में, छिनता प्यार दुलार।।
सुधीर श्रीवास्तव
गोण्डा उत्तर प्रदेश