अनुराग लक्ष्य, 25 जून
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी
मुम्बई संवाददाता ।
इस्लाम का पहला तारीखी महीना मुहर्रम इस वक्त पूरी दुनिया में बड़े ही अकीदत और मुहब्बत के साथ नवास ए रसूल सुल्तनूत शोहदा हज़रत इमाम हुसैन की शहादत को अपनी नम आंखों से खिराज ए अकीदत पेश कर रहा है।
इस मौके पर दुनिया का हर कलमा गो अपने अपने अंदाज़ में सुल्तानूत शोहदा हज़रत ए इमाम हुसैन की शहादत को याद कर रहा है। जिसमें शायर अदीब और फनकार अपने अपने ग़म का इज़हार भी कर रहे हैं। इसी फेहरिस्त में मुंबई के अदबी हल्के से एक ऐसे संजीदा शायर को आज हम इमाम हुसैन के ग़म में डूबे कुछ अशआर आप तक पहुंचा रहे हैं, दुनिया ए अदब जिन्हें मोहतरम इमरान गोंडवी के नाम से जानती और पहचानती है।
1 / आसमान ए अर्श पर यूँ जगमगाई कर्बला,
करबलाई हो गई सारी खुदाई कर्बला ।
2 / दास्तान ए चश्म ए तर की है यही इतना सबब,
आ गया माह ए मोहर्रम याद आयी कर्बला ।
3 / किस को तेरी मार्फत , किसको तेरा इरफान है,
जो करे अज़मत पे तेरी लब कुशाई कर्बला ।
4 / जान ए अहमद, जान ए ज़ोहरा है तेरी आग़ोश में,
कम कभी होगी न तेरी पारसाई कर्बला ।
5 / जो भी आता है अकीदत से यहाँ उस शख्स की,
करते हैं मुश्किल कुशा मुश्किल कुशाई कर्बला ।
6 / तुझपे नंगे पांव चलते हैं सलातीन ए जहाँ,
तूने तो क्या ख़ूब है तकदीर पाई कर्बला ।
7 / मुस्तफा ओ मुर्तुज़ा शब्बीर ओ शबर के तुफैल,
है ख़ुदा ए पाक तक तेरी रसाई कर्बला ।
8 / मर्तबा तेरा भला कैसे घटाएगा कोई,
अर्श पर तहरीर है तेरी बड़ाई कर्बला ।
9 / देखकर ,इरफान, की आँखों को यह कहना पड़ा,
रँग लाई है तेरी जलवा नुमाई कर्बला ।
पेशकश, सलीम बस्तवी अज़ीज़ी