संगीत कार्यशाला

संगीत कार्यशाला

 

संगीत प्रशिक्षण शिविर में,

सब एकत्रित हुए राजगीर।

एक से एक प्रतिभा उभरेंगे,

बस थोड़ी प्रतीक्षा,थोड़ा धीर।

यह संध्या है “सुर संगम” का।

सुधिजनों, गुणी जनों के समागम का।

परम ‘अनुराग’ से यह प्रांगण सुसज्जित है

हृदय मनके ‘मनीष’ हैं, तो सुर ‘मंडल’ ध्वनित है।

श्री ‘भीम’ और श्री ‘लाल’ से, यह मंच भी हर्षित है।

बड़े ही ‘विवेक’ से ‘दीनानाथ’ का

स्वर ‘आनंद’ से गुंजित है।

यह ‘शुभ कृति’ का क्षण है।

यहाँ निधि’-‘सुनिधि’ के मेल से

संगीत की “सरिता” बहेगी,

स्थाई से आरम्भ हो,

‘अंतरा’ की ‘ज्योति’ जगेगी।

‘अरुणा’ की ‘अरुणिमा’ से

भाव की ‘प्रतिमा’ गढ़ेगी।

‘विनय’ की ‘सुचेता, विनीता’ से

‘राधा गोविंद’ की ‘स्मिता’ रहेगी।

‘श्रीराम’ के ‘प्रसाद’ से

‘वंदना’ और ‘आरती’ की ‘मधुमिता’ लहेगी।

एक ओर जहाँ ‘राजीव’, ‘मुकेश’, ‘मनोज’ हैं।

तो दूजी ओर ‘सुमी’, ‘सोनी’, ‘संजीव’, ‘विनोद’ हैं।

‘संजय’ का दिव्य ‘कमल’ खिला है।

जो ‘अंजनी’, ‘प्रिया’, ‘अमरेंद्र’ हैं।

‘श्वेत’, ‘सुमन’ पर ‘कामोद’ संग ‘शंकर’ विराजे

‘चंचल’ हुईं ‘किरणें’ तो

‘स्नेहलता’ के स्वर साजे।

‘अजय’, ‘अमर’ ‘प्रदीप्त’ है,

यह ‘तृप्ति’ का क्षण,

लय, ताल में रमेगा, ‘शालू’ का मन।

न जाने कितने संगीत अनुरागियों से,

यह सभा पुलकित है,

आप सभी को साधुवाद,

‘अणिमा’ का यथोचित है।

 

डॉ अणिमा श्रीवास्तव

संगीत शिक्षिका

केंद्रीय विद्यालय, आरा