ओ३म्
-आर्यसमाज धामावाला का रविवारीय सत्संग-
“सुखी होने के लिये अपनी इच्छाओं को कम करना चाहियेः स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक”
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हम आज दिनांक 11-5-2025 को आयोजित आर्यसमाज धामावाला, देहरादून के रविवारीय सत्संग में सम्मिलित हुए। प्रातः 8.00 बजे से आर्यसमाज के पुरोहित पं. विद्यापति शास्त्री जी ने यज्ञशाला में यज्ञ कराया जिसमें आर्यसमाज के कुछ सदस्यों सहित श्रद्धानन्द बाल वनिता आश्रम के बालक एवं बालिकायें भी सम्मिलित हुईं। यज्ञ के बाद आर्यसमाज के सभागार में सत्संग आरम्भ हुआ। सत्संग का आरम्भ बाल वनिता आश्रम की पांच कन्याओं के एक सामूहिक भजन से हुआ जिसमें माता-पिता के उपकारों का गुणगान किया गया था। इसके पश्चात आर्यसमाज के एक पुराने 65 वर्षीय सदस्य श्री अश्विनी कुमार मिनोचा जी का एक भजन हुआ। इस गीत की एक पंक्ति थी ‘मेरा गुरु वही है गुजरात से जो आया। योगी ऋषि कहलाया।’ आर्यसमाज के पुरोहित पं. विद्यापति शास्त्री जी गान विद्या में निपुण हैं। उन्होंने भी ईश्वर से सम्बन्धित एक प्रसिद्ध भजन सुनाया जिसके बोल थे ‘हे प्रभु परम पिता तुम गुणों की खान हो, तुम अनादि तुम अनन्त पूर्ण तुम महान हो।’ सत्संग में सामूहिक प्रार्थना श्रद्धानन्द बाल वनिता आश्रम के दो बच्चों ने प्रस्तुत की।
आज सत्संग में रोजड़ के दर्शन योग महाविद्यालय के निदेशक एवं आर्यसमाज के समर्पित विद्वान स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक जी पधारे थे। स्वामी जी ने अपने सम्बोधन में कहा कि संसार में तीन पदार्थ अनादि हैं। उन्होंने कहा कि अनादि का अर्थ होता है कि जिसका आदि वा आरम्भ न हो। जिस वस्तु की उत्पत्ति कभी नहीं हुई होती, उसे अनादि कहते हैं। उन्होंने कहा कि जो वस्तु वा वस्तुयें उत्पन्न होती हैं वह नष्ट भी होती हैं। जो वस्तु उत्पन्न नहीं होती वह नष्ट भी नहीं होती है, यह संसार का एक नियम है। स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक जी ने कहा कि संसार में तीन पदार्थ ईश्वर, आत्मा एवं प्रकृति अनादि पदार्थ हैं। उन्होंने कहा कि हमारा यह संसार उत्पन्न भी होता है और नष्ट भी होता है। हम सब आत्मा व आत्मायें हैं। हमारी व सभी मनुष्यों की आत्माओं को हम अपनी आंखों से देख नहीं पाते हैं। शरीरों को हम आंखों से देख सकते हैं वा देखते हैं। स्वामी जी ने कहा कि आत्मा और शरीर अलग-अलग हैं। उन्होंने कहा कि शरीर उत्पन्न होता है आत्मा उत्पन्न नहीं होता।
स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक जी ने कहा कि जो वस्तु आंखों से दिखाई देती है उसे उस वस्तु का प्रत्यक्ष ज्ञान एवं प्रत्यक्ष प्रमाण कहते हैं। जो वस्तुयें हमें आंखों से दिखाई नहीं देती हैं उन्हें हम अनुमान वा अनुमान प्रमाण से जानते हैं। धुएं को देखकर वहां अग्नि के होने का अनुमान होता है। इस प्रमाण को अनुमान प्रमाण कहते हैं जिसमें हम धुएं को देखकर वहां अग्नि की उपस्थिति को जानते हैं। इसी प्रकार अपनी व दूसरों में आत्मा के होने को जानने के लिये भी हमें अनुमान प्रमाण का सहारा लेना पड़ता है।
स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक जी ने आत्मा के लक्षण इच्छा, द्वेष आदि की चर्चा सत्संग में की और इनके बारे में श्रोताओं को समझाया। स्वामी जी ने कहा कि सुखी होने के लिये मनुष्यों को अपनी इच्छाओं को कम करना चाहिये। इच्छाओं को पूरा करने से इच्छायें बढ़ती हैं। स्वामी जी ने कहा कि किसी व्यक्ति की सभी इच्छायें पूरी नहीं हो सकतीं। उन्होंने कहा कि दुःखों का कारण इच्छाओं का पूरी न होना हुआ करता है। दुःखों से बचने के लिये आप अपनी इच्छाओं को कम करें। जो इच्छा पूरी न हो सकती हो उसे छोड़ देना चाहिये। इसके कुछ उदाहरण भी स्वामी जी ने श्रोताओं को दिये।
स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक जी ने कहा कि मनुष्य को उचित कारण होने पर क्रोध आना ही चाहिये। उन्होंने पहलगाम में हुई आतंकवादी घटना का उल्लेख किया और कहा कि इस घटना के होने पर सभी को गुस्सा आना स्वाभाविक है और वह आना ही चाहिये। स्वामी जी ने आगे कहा कि मनुष्य को अपनी ओर से किसी के प्रति अन्याय नहीं करना चाहिये। उन्होंने यह भी कहा कि यदि कोई अन्याय करता है तो उस अन्यायकारी को छोड़ना भी नहीं चाहिये। स्वामी जी ने कहा कि दण्ड दिये बिना कोई सुधरता नहीं है। किसी व्यक्ति का सुधार करने के लिये दण्ड आवश्यक है। इसके भी स्वामी जी ने अनेक उदाहरण दिये। स्वामी जी ने यह भी कहा कि सभी मनुष्यों को ईश्वर से मिलने वाले दण्ड को याद रखना चाहिये और ऐसे कर्मों को करना चाहिये जिसमें अन्याय न हो और ईश्वर से दण्ड मिलने की सम्भावना न हो। ईश्वर के दण्ड का उल्लेख करते हुए स्वामी जी ने कहा कि मनुष्य अपराधियों को सुअर, गधा, घोड़ा व कुत्ता आदि बनाकर उसके बुरे कर्मों का दण्ड देता है। विद्वान स्वामी जी ने कहा कि मनुष्य जिन कर्मों को करता है उनका फल उसे भोगना पड़ता है। पाप कर्मों का दण्ड ईश्वर देता है। मनुष्य का किया गया कोई भी पाप माफ नहीं होता है। स्वामी जी ने कहा कि ईश्वर न्यायकारी है। न्यायकारी होने के कारण ही ईश्वर किसी मनुष्य के किसी पाप को क्षमा नहीं करता है। यदि वह किसी के पापों को क्षमा करेगा तो वह पक्षपाती कहलायेगा, न्यायकारी नहीं कहलायेगा। स्वामी जी ने सत्संग में उपस्थित श्रद्धानन्द बाल वनिता आश्रम के बालक बालिकाओं को अनेक उपयोगी बातें बताई जिनको जीवन में अपनाकर मनुष्य का जीवन सफल होता है। स्वामी जी ने यह भी बताया कि हम अपने शरीर के जिस साधन से विचार व चिन्तन-मनन करते हैं उसका नाम ‘मन’ है। स्वामी जी ने सदस्यों की शंकाओं का समाधान भी किया। उन्होंने प्रो. डा. नवदीप कुमार जी की शंका का समाधान करते हुए बताया कि जिन आत्माओं की समाधि प्राप्त होने व सद्कर्मों के कारण से मुक्ति हो जाती है, उनका मोक्ष की अवधि व्यतीत होने के बाद पहला जन्म मनुष्य योनि में होता है, किसी अन्य मनुष्येतर योनि में नहीं होता।
आर्यसमाज के प्रधान श्री सुधीर गुलाटी जी ने स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक जी को उनके ज्ञानवर्धक उद्बोधन के लिये धन्यवाद किया और सूचनायें दी। कार्यक्रम का संचालन आर्यसमाज के युवा एवं ऊर्जावान मंत्री श्री नवीन भट्ट जी ने किया। प्रधान जी ने सभा में सूचित किया कि आर्यसमाज धामावाला के अन्तर्गत संचालित श्रद्धानन्द बाल वनिता आश्रम के अधिष्ठाता श्री सुभाष चन्द्र गोयल जी की धर्मपत्नी श्रीमती वीरा गोयल जी का निधन हो गया है। श्री सुभाष चन्द्र गोयल जी सिंचाई विभाग, उत्तराखण्ड से अधीक्षण अभियन्ता के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं और आश्रम को अपनी सेवायें दे रहे हैं। सूचना दी गई कि आज उनकी धर्मपत्नी माता श्रीमती वीरा गोयल जी की श्रद्धांजलि सभा राजपुर रोड, देहरादून स्थित स्वामी रामतीर्थ मिशन सभागार में अपरान्ह 3.00 बजे से है। आर्यसमाज के सभागार में उपस्थित सभी सत्संग प्रेमियों ने माता वीरा गोयल जी को मौन रखकर श्रद्धांजलि दी। इसी के क्रम में गायत्री मन्त्र एवं शान्ति पाठ कर आज का सत्संग समापत हुआ। ओ३म् शम्।
-मनमोहन कुमार आर्य