साहित्य में अरुचि-नीरज कुमार वर्मा नीरप्रिय

साहित्य में अरुचि
सहितस्य भाव: साहित्यम्‌ यानी जिसमें हित साधन की व्यापक भावना हो वही साहित्य होता है। ऐसे साहित्य की जरुरत मनुष्य को आदि से रही है और अंत तक रहेगी। यह जन्म से ही मनुष्यता के साथ जुड़ा हुआ है। इसका संबंध मनुष्य के आत्मजगत से होता है। इसी से मनुष्य के आत्मजगत को विस्तार मिलता है तथा उसके अंदर सामाजिकता का सृजन होता है। वह अपने व्यक्तिगत हितों के संकुचित दायरों से ऊपर उठकर संपूर्ण संसार के विषय में सोचने लगता है। मानव के जीवन में जो भी पीड़ा,संत्रास तथा संकट आदि आते हैं वह उससे संवेदित होता रहता है। आज रुस- युक्रेन तथा इजरायल-फिलीस्तीन के बीच निरंतर युद्ध हो रहे हैं तथा दोनों तरफ से मिसाइलें दागी जा रही है। इसमें असहाय, बेबश तथा निरीह जनता मारी जा रही है। इस युद्ध का भले हमारे देश से कोई लेना-देना नहीं है पर एक साहित्य में अभिरुचि रखने वाला लेखक या पाठक मानवता की रक्षा के लिए संवेदनशीलता से अपने पीड़ा का इजहार करता रहता है। सच्चे अर्थों में साहित्य हमें जीवन की वास्तविकताओं से रुबरु कराने के साथ उसकी अनुभूति भी कराता है। रविन्द्र नाथ टैगोर ने ठीक ही लिखा है कि जो व्यक्ति पेड़ लगाता है यह जानते हुए कि वह उसकी छाया में कभी नहीं बैठेगा उसने जीवन का अर्थ समझना शुरू कर दिया है।
साहित्य की इस पैरोकारिता के साथ हम ज्ञान विज्ञान से संबंधित विषयों को खारिज नहीं कर सकते हैं।यह विज्ञान के प्रति लगन और निष्ठा रही है कि आज विभिन्न आविष्कारों‌ के कारण मनुष्य के लिए जीवन यापन करना काफी आसान व सुविधाजनक हो गया है। चिकित्सा, संचार, परिवहन तथा अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के संदर्भ में जो खोजें हुई है वे मानवता के हित साधन में सदैव तत्पर है। पर इसी वैज्ञानिक ज्ञान के अति का प्रभाव होता है कि मनुष्य का भाव पक्ष शून्य हो जाता है तथा ज्ञानपक्ष हावी हो जाता है। ऐसे में‌ वह उपयोगितावाद के आगोश में इस कदर आ जाता है कि वह विभिन्न मानव मूल्यों जैसे प्रेम,करुणा,परोकारिकता तथा पर दु:खकातरता को तुच्छ समझने लगता है। इस स्थिती में साहित्य की अनिवार्यता मनुष्यता को बरकरार रखने के लिए नितांत लाजिमी हो जाती है। यह एक तरह से मनुष्य तथा समाज को संस्कारित करने का कार्य करता है। विज्ञान जहां परमाणु बम का आविष्कार करता है तो साहित्य उसे विस्फोट करने से रोकता है। सच ही कहा गया है-
तहजीब भी जरुरी है तालीम के साथ साथ।
सिर्फ डिग्रियां ले लेने से सलीके नहीं आते।।
साहित्य मनुष्य के जीवन की एक संस्कृति की यात्रा है। जिसमें आत्मा की खोज से आत्मबिस्तार तक की यात्रा जारी रहती है। लेकिन इधर हाल के दशकों से देखा जा रहा है की साहित्य के प्रति लोगों का आकर्षण कम होता जा रहा है‌। बाजारवादी संस्कृति इतना हावी होती जा रही है कि लोग येन-केन प्रकारेण में धन इकट्ठा करने में लगे रहते हैं। उनका सारा दिमाग सदा निन्यानबे के फेर में लगा रहता है। जैसे-तैसे लाख को करोड़, करोड़ को अरब तथा अरब को खरब बनाने में लगे रहते हैं। अर्थ और काम की इस लिप्सा से उसके जीवन को पशुवत बना दिया है। उसे उसमें ही आनंद आने लगता है। फिर उसे साहित्य की आवश्यकता महसूस ही नहीं होती है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल लिखा है कि अंत: प्रकृति में मनुष्यता को समय-समय पर जागते रहने के लिए कविता मनुष्य जाति के साथ लगी चली आ रही है और चलती चलेगी। जानवरों को इसकी आवश्यकता नहीं होती।
यह सच्चाई है कि आज मध्यवर्ग का विस्तार हुआ है। उसकी साक्षरता बढ़ी है तथा उसकी आम में भी इजाफा हुआ है। मगर दिलचस्प बात यह है कि उसमें सांस्कृतिक निरक्षरता का क्षरण हुआ है। मध्यम वर्ग का वह हिस्सा जो कभी सामाजिक तथा राजनीतिक रूप से जागरूक था, विभिन्न आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी करता था,किसान मजदूर तथा शोषितों के लिए तूलिका और ताकत से लड़ता था। वह आज इनसे विमुख होता जा रहा है। स्वार्थ और भौतिकता उसमें इस कदर हावी हो गया है कि साहित्य उनके लिए गौण हो गया है। ऐसा नहीं है कि उनके पास खाली वक्त तथा पैसा नहीं है पर वे अब अपने कीमती समय को अब दुकानों पर गप्पबाजी में जाया करते है तथा धन से भौतिक सुख-सुविधाओं को जुटाने में लगे रहते हैं। मध्यम वर्ग, अमीर वर्ग के अन्धानुकरण में अपने मूल्यों से कटता जा रहा है। एक दौर वह भी था जब कुलीन परिवारों में साहित्य और कला को बहुत ऊंचा स्थान प्राप्त था। रविंद्र नाथ टैगोर, भारतेंदु हरिश्चंद्र तथा प्रेमघन आदि कुलीन साहित्यकारों के घर में न केवल साहित्य का सम्मान था बल्कि इन महानुभावों ने साहित्य का सृजन करके समाज की चेतना का परिष्कार किया। वहीं आज तथाकथित संभ्रांत कहे जाने वालों का साहित्य और संस्कृति से दूरी बढ़ती जा रही है। मध्यमवर्ग भी इन्हीं से प्रेरणा लेकर अपने स्वार्थ के घोंसले में कैद हो गया है। जिससे उसके पठन संस्कृति के जो पंख थे वे सिकुड़ गये है-
घोंसला बनाने में हम यूं मशगूल हो गये।
कि उड़ने को पंख भी है, इसको भूल ही गये।।
आज का दौर सोशल मीडिया का है। इस प्लेटफार्म पर पढ़ने वालों की संख्या तो बड़ी है पर उनके प्रवृत्ति में जिस गंभीरता तथा सजगता की जरुरत होती है वह कम होती जा रही है। वह फौरी तौर पर साहित्य को सिर्फ मनोरंजन के लिए पढ़ता हैं। इन प्लेटफार्मों पर जिन्हें साहित्यकार बताया जाता है अमूमन वे स्टैंडिंग कॉमेडी करने वाले होते हैं जो साहित्य के नाम पर अश्लीलता तथा फूहड़ता परोसते रहते हैं। जिससे साहित्यिक अभिरुचि में विकृतियों का आना स्वभाविक हो जाता है। रील्स ने तो साहित्यिक अभिरुचि को बिगाड़ने में चार चांद लगा दिया है। असल में ये ऐसे छोटे वीडियो होते हैं जो एक मिनट में हमें चरम पर पहुंचा देते हैं‌। जिस क्लाइमैक्स तक पहुंचने के लिए पूरी साहित्यिक कृत से गुजरना होता है वहां ये वीडियो चंद लम्हों में पहुंचा देते हैं। किसी कृति के क्लाइमैक्स तक जाते-जाते मनुष्य की मस्तिष्क में डोपामाइन नामक रसायन का श्राव होता है। यही रसायन आनंद की अनुभूति कराता है। मनुष्य शार्ट्स से देखकर इस प्रवृत्ति को दोहराता रहता है जिससे वह समय को भूल जाता है और उसे लत लग जाती है। इस आदत के कारण उसके अंदर धैर्य और एकाग्रता नष्ट हो जाती है जबकि साहित्य को पढ़ने के लिए इन चीजों का होना नितांत आवश्यक होता है। ऐसे में साहित्य जिस धैर्य , एकाग्रता तथा समय की मांग करता है उसका व्यक्ति के जीवन में ह्रास होता जा रहा है। जिसके कारण आम जीवन से साहित्य का नाता टूट रहा है।
साहित्य का केन्द्रबिंदु उसकी विषय वस्तु होता है। किसी भी साहित्यिक कृति के गुणवत्ता का निर्धारण उसके सामाजिक मूल्यों से होता है। पर आज हमें वेस्ट सेलर के नाम पर साहित्य को वस्तु के रूप में बदल रहे हैं। मांग और पूर्ति के आधार पर हम उसकी उपयोगिता का निर्धारण करने लगे हैं। पर हमें यह ध्यान रखना होगा कि प्रेमचंद से अधिक पाठक गुलशन नंदा के रहे हैं‌। क्या इससे साबित हो सकता है कि गुलशन नंदा के उपन्यास समाज-संस्कृति और मनुष्यता के प्रति व्यापक समझ को व्यक्त करते हैं? वेस्ट सेलर बनने के लिए आजकल तमाम नौकरशाह, अकादमियन तथा राजनेता अपने पद व पैसा का उपयोग करके भले ही यह मुकाम हासिल करके डिंगे हांकने लगे पर उनका साहित्य एक तरह से अभिरुचि उत्पन्न न करके अच्छी कृतियों को नेपथ्य में धकेलने का कार्य करता है। इसी तरह लिटरेरी फेस्टिवल आयोजित करके साहित्यिक मूल्यों को विस्थापित करके बाजार मूल्यों को स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है। बेस्ट सेलर तथा इन उत्सवों के चक्कर में पड़कर पाठक भ्रमित हो जाता है जिससे वह गंभीर साहित्य तथा लोकप्रिय साहित्य में अंतर नहीं कर पाता है। लोकप्रियता के चक्कर में उसका सामना ऐसी कृतियों से होता है जिससे उसकी पाठक वृत्ति में अरुचि हो जाती है।
एक समय था जब स्कूलों कॉलेजों में हफ्ते में एक दिन बाल सभा होती थी। जहां बच्चों को कविता तथा कहानी आदि सुनाने के लिए तैयार किया जाता था। बच्चों से अंत्याक्षरी प्रतियोगिता कराई जाती थी तथा कक्षा के सभी बच्चे इसमें उमंग से भाग लेते थे। यह प्रतियोगिता तहसील, जिला तथा मंडल स्तर पर आयोजित होती थी। जिसमें बच्चे सूरदास और मीरा के पद, कबीर,रहीम दास के दोहे, गिरधर की कुंडलियों से लेकर के मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा नवीन, रामधारी सिंह दिनकर, हरिबंश राय बच्चन, सुमित्रानंदन पंत, जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला तथा महादेवी वर्मा आदि की कविताएं सुनाते थे। इन सभी कवियों की दो-चार कविताएं बच्चों के जुबां रहती थी। जिसे वह काफी मस्ती से सुनाया करते थे। कुछ बच्चे इतनी होशियार हो जाते थे कि इन कविताओं से प्रेरणा लेकर स्वयं रचना भी करने लगते थे। ऐसी प्रतियोगिताओं से बच्चों के बाल मन में साहित्य के प्रति आकर्षण उत्पन्न होता था। पर अब अंत्याक्षरी की यह जीवंत प्रतियोगिता निर्जीव हो गई है। ऐसे बाल मन में अभिरुचि का न होना स्वाभाविक है।
बढ़ती हुई मुनाफखोरी तथा महंगाई के कारण पत्र पत्रिकाओं की निरंतरता बरकरार रखना काफी कठिन होता जा रहा है। साप्ताहिक हिंदुस्तान, धर्मयुग, सारिका तथा कादंबिनी आदि लोकप्रिय पत्रिकाएं का प्रकाशन बहुत पहले से ही बंद हो गया है। हंस,आजकल, वागर्थ, बया, दिशा संधान,तद्भव, शबद निरंतर तथा साहित्य अमृत जैसी पत्रिकाएं आज भी निकल रही हैं। पर उनकी प्रसार संख्या उस स्तर की नहीं है कि गांव का एक आम पाठक इसे प्राप्त कर सकें। ये पत्रिकाएं केवल महानगरों की कुछ चुनिंदा दुकानों पर ही मिलती हैं। पत्रिकाओं की प्रसार में कमी तथा दैनिक अखबारों में साहित्यिक स्पेस की कमी के कारण पाठक यदि पढ़ना भी चाहता है तो उसे सामाग्री उपलब्ध नहीं हो पाता है। एक समय था जब दैनिक आज के अंकों में राहुल सांकृत्यायन, संपूर्णानंद ,आचार्य नरेंद्रदेव, सीताराम चतुर्वेदी, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, त्रिलोचन शास्त्री, नामवर सिंह जैसे नए पुराने लेखकों की रचनाएं छपती थी। उसमें बच्चों के लिए एक अलग पन्ना बाल क्लब होता था। विवेक राय मनबोध मास्टर की डायरी नामक कालम लिखते थे तो चतुरी चाची की चिट्ठी भोजपुरी में छपती थी। लोग उन्हें पढ़ने के लिए बेसब्री से इंतजार करते थे ‌अखबारों की यह साहित्यिक पृष्ठ आज गायब हो गये है। कुछ अखबारों के साहित्यिक परिष्शिटि आज भी निकलते हैं पर उसमें सिने तारिकाओं के नंगी और अधनंगी तस्वीरों के साथ चटपटी खबरें रहती है।
इसके अतिरिक्त साहित्य के विभिन्न विधाओं जैसे काव्य, नाटक, एकांकी ,उपन्यास, निबंध, कहानी आदि के सृजन में समतुल्यता नहीं दिख रही है। आज महाकाव्य, नाटक, एकांकी जैसे विधाओं पर नाम मात्र का लेखन हो रहा है। लेखकों तथा साहित्यकारों को सरकार व समाज का संरक्षण नहीं मिल पा रहा है जिससे वे स्वतंत्र रुप से मनोभावों को व्यक्त कर सके। महंगाई की मार तथा विभिन्न प्रकार की जकड़नों ने उन्हें इस प्रकार केन्द्रित कर लिया है कि वे एक सीमित विषय वस्तु पर लिखने को बाध्य हो रहे हैं। इसके अतिरिक्त अतिशय भोगवाद,अतिशय वैयक्तिकता तथा आभासी दुनिया का बोलबाला साहित्य अरुचि को विस्तार दे रहा है।

नीरज कुमार वर्मा नीरप्रिय
किसान सर्वोदय इंटर कालेज रायठ बस्ती (उ.प्र.)
मो. 8400088017