उफ़ ये चालीस का बुढ़ापा

उफ़ ये चालीस का बुढ़ापा

बस यूं जिये जा रहे हैं,

बेवजह कश्मकश में

ख़ुद को किये जा रहे हैं,

वो प्रेम की स्याह में

लिपटी यादों को,

कल के सहारे किये जा रहे हैं,

चालीस का बुढ़ापा बस यूं ही जिये जा रहे हैं।

बीस की बेफिक्री,

तीस की चेतना,

इस उम्र में अब

किसके सहारे किये जा रहे हैं,

बेवजह की बातों में

सुन्दर एहसासों की बलि दिये जा रहे हैं,

चालीस का बुढ़ापा बस यूं ही जिये जा रहे हैं

अभी तो उम्र बाकी है सजाने की,

अनगिनत मीठी यादें बनाने की,

हमसफ़र का हाथ पकड़ के हाथों में

नि:शब्द प्रेम में डूब जाने की,

तुम्हारे मन के भाव को पढ़े जा रहे हैं,

यूं ही, बस यूं ही चालीस का बुढ़ापा जिये जा रहे हैं।।

– दीप्ति त्रिपाठी

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