जब समुंदर से नदी हंस के मिली। चार सू बजनें लगी शहनाइयां।।

ग़ज़ल

हर तरफ है धुंध हर्षित खाइयां।
उनकी अब दिखती नहीं परछाइयां।।

मस्तियां हैं और हैं अंगड़ाइयां।
क्या बिगाड़ेंगी ये रुख की झाइयां।।

फ़ूल के बदले में है कांटे मिले।
आंखों ने देखी नहीं रानाइयां।।

ज़ख्म भरते ही कहां हैं इश्क़ के।
बैठकर करते रहो तुरपाईयां।।

जब समुंदर से नदी हंस के मिली।
चार सू बजनें लगी शहनाइयां।।

कोशिशें कर लो हज़ारों तुम मगर।
छुप नहीं सकती कभी सच्चाईयां।।

विनोद उपाध्याय हर्षित